Wednesday, 22 September 2021

भक्ति-आंदोलन: इस्लाम की भूमिका से सम्बंधित विवाद

 

भक्ति-आंदोलन का आविर्भाव: इस्लाम की भूमिका

(आचार्य शुक्ल : आचार्य द्विवेदी)

भक्ति-आन्दोलन के आविर्भाव ने आरम्भ से ही हिन्दी साहित्य के आलोचकों उद्वेलित किया है। अगर ‘द मॉडर्न वर्नाकुलर लिटरेचर ऑफ़ हिन्दुस्तान’ के लेखक जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने भक्ति-आन्दोलन के आकस्मिक प्रादुर्भाव की बात करते हुए इसे ईसाईयत की देन बतलाया, तो ताराचन्द ने इसे अरबों की देन। अर्नेस्ट बिनफील्ड हैवेल ने भक्ति-आन्दोलन को भारत में मुस्लिम-सत्ता की स्थापना और इसके कारण हिन्दुओं के राज-काज से अलग होने से सम्बद्ध करके देखा, तो आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने इस्लामिक सत्ता के अविर्भाव की पृष्ठभूमि में राजनीतिक परिस्थितियों में आने वाले परिवर्तन को भक्ति-आन्दोलन के उत्प्रेरक के रूप में देखा।  लेकिन, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इसे इस्लाम की प्रतिक्रिया मानने से इनकार करते हुए ‘भारतीय चिन्ताधारा का स्वाभाविक विकास माना। इस पृष्ठभूमि में यह प्रश्न सहज ही उठता है कि क्या भक्ति-आन्दोलन के आविर्भाव में वाकई इस्लाम की भूमिका रही, और अगर हाँ तो कहाँ तक?

आचार्य द्विवेदी बनाम् आचार्य शुक्ल:

भक्ति-आंदोलन के आविर्भाव के सन्दर्भ में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की दोनों पुस्तकों 'हिंन्दी साहित्य की भूमिका' (प्रकाशन-वर्ष: सन् 1940) और 'हिंदी साहित्य: उद्भव और विकास’ (प्रकाशन-वर्ष: सन् 1952)' से गुजरते हुए ऐसा महसूस होता है कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल न तो परम्परा से परिचित थे, न सिद्ध-नाथों  की चुनौती से और न ही लोक और शास्त्र के द्वंद्व से। और तो और, जिस तरीके से आचार्य द्विवेदी ने भक्ति आंदोलन के आविर्भाव के संदर्भ में आचार्य रामचंद्र शुक्ल की व्याख्या को खारिज करते हुए उसके उपहासास्पद होने का संकेत दिया है, उससे इस बात का संकेत मिलता है कि शायद आचार्य शुक्ल को भक्ति-आन्दोलन की समझ ही नहीं थी। इस क्रम में आचार्य द्विवेदी कई बार अति-उत्साह में आलोचकीय मर्यादा का अतिक्रमण करते हुए दिखाई पड़ते हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि आचार्य शुक्ल और आचार्य द्विवेदी के मत में मात्रात्मक भिन्नता तो है, पर तात्विक भिन्नता नहीं।

समानता के बिन्दु:

यदि गहराई से आचार्य शुक्ल और आचार्य द्विवेदी के मतों का विश्लेषण किया जाए, तो उनके बीच कई समानताओं को रेखांकित किया जा सकता है जो उन्हें एक दूसरे के करीब लाकर खड़ा कर देती है। उनके बीच के सादृश्य को निम्न संदर्भों में देखा जा सकता है:

1.  आकस्मिक प्रादुर्भाव का खंडन: भक्ति-आन्दोलन की व्याख्या के क्रम में आचार्य द्विवेदी ने ग्रियर्सन महोदय के 'आकस्मिक प्रादुर्भाव' वाले मत को खारिज करते हुए कहा, “इसके लिए पहले से मेघखण्ड उपस्थित हो रहे थे।” उनका इशारा भक्ति की भावधारा के क्रमिक विकास की ओर है और उनका यह मत सर्वविदित है। लेकिन, इस संदर्भ में आचार्य शुक्ल का मत आचार्य द्विवेदी से अलग नहीं है। हाँ, यह जरूर है कि वे न तो सीधे -सीधे ग्रियर्सन से टकराते हैं और न ही स्पष्ट शब्दों में ग्रियर्सन के मतों को खारिज करते हुए दिखाई देते हैं। इसकी पुष्टि इस बात से होती है कि आचार्य शुक्ल ने भक्ति-आंदोलन को आदिकालीन ऐतिहासिक विकास की प्रक्रिया में रखकर देखा है। इतना ही नहीं, वे भक्ति की परम्परा की पूर्व से विद्यमानता की ओर इशारा करते हैं और उसे दक्षिण भारतीय वैष्णव-भक्त आलवारों की परम्परा से सम्बद्ध करके देखते हैं। उनका यह भी मानना है कि इस्लाम की आगमन के पूर्व से ही भक्ति की यह भाव धारा दक्षिण भारत से उत्तर भारत की ओर धीरे -धीरे एवं क्रमिक रूप से प्रवाहित हो रही थी। स्पष्ट है कि दोनों ग्रियर्सन के ‘आकस्मिक प्रादुर्भाव’ और ‘ईसाईयत की देन’ वाले मत से असहमत हैं, लेकिन असहमति प्रदर्शित करने का दोनों का तरीका अलग- अलग है।

2.  परम्परा का स्वाभाविक विकास:- आचार्य शुक्ल और आचार्य द्विवेदी दोनों भक्ति की भाव-धारा को भारतीय परम्परा से संबद्ध करके देखते हैं और इसकी व्याख्या पूर्ववर्ती परम्परा की स्वाभाविक विकास के रूप में करते हैं।

3.  इस्लाम की भूमिका: भक्ति-आन्दोलन के आविर्भाव के व्याख्या के क्रम में यदि आचार्य शुक्ल ने प्रत्यक्षतः की भूमिका को स्वीकारा है, तो आचार्य द्विवेदी ने परोक्षतः। आचार्य शुक्ल ने युगीन राजनीतिक परिस्थितियों के बहाने इस दिशा में संकेत किया है, लेकिन उनके इस संकेत को जब आदिकालीन ऐतिहासिक विकास की प्रक्रिया से सम्बद्ध कर देखे जाने पर इस्लाम की भूमिका के प्रति उनकी आग्रहशीलता सतह पर आ जाती है। लेकिन, आचार्य द्विवेदी ने भक्ति-आन्दोलन को इस्लाम की प्रतिक्रिया मानने से इनकार किया है। उन्होंने इस्लाम की भूमिका को खारिज करते हुए भी उसके लिए 'चार आना' वाला स्पेस छोड़ा है और अपनी बातों को आगे बढ़ाते हुए कहा, "इन सबका अर्थ यह नहीं कि मुसलमानी धर्म का प्रभाव साहित्य पर नहीं पड़ा। पर, प्रभाव को प्रभाव के रूप में ही स्वीकार किया जाना चाहिए प्रतिक्रिया के रूप में नहीं।"

4.  टीका-ग्रंथों, निबन्धों और भाष्यों की चर्चा: भक्ति-आन्दोलन के चर्चा के क्रम में आचार्य शुक्ल का भी ध्यान उन टीकाओं, निबन्धों और भाष्यों की ओर गया जिनकी मध्ययुग में रचना हुई और आचार्य द्विवेदी का भी। आचार्य शुक्ल ने मध्ययुग में लिखे गए जिन भाष्यों की चर्चा की है, जिन अर्थ शून्य बाहरी कर्म-विधानों का उल्लेख किया है, वे इन्हीं टीकाओं और निबन्ध-ग्रंथों की उपज हैं। आचार्य द्विवेदी भी टीका-ग्रंथों एवं निबन्धों की रचना की पृष्ठभूमि को स्पष्ट करते हुए वे लिखते हैं, “इस्लाम के खतरे से अपने धर्म और जाति को बचाने के लिए भारतीय मनीषा जो उस समय कर रही थी, उसी का परिणाम टीका और निबन्ध हैं।”

सादृश्य के उपरोक्त बिंदुओ के आलोक में यह अस्पष्ट नहीं रह जाता है कि आचार्य शुक्ल और आचार्य द्विवेदी की भक्ति-आन्दोलन की व्याख्या में तात्विक भिन्नता की सम्भावनाओं की तलाश उचित भी नहीं और सम्भव भी नहीं, मात्रात्मक भिन्नता चाहे जितनी हो।

भिन्नता के बिन्दु:

ऐसी स्थिति में यह प्रश्न सहज ही उठता है कि फिर भक्ति-आन्दोलन की व्याख्या को लेकर दोनों आचार्य किस प्रकार एक दूसरे से अलग हैं? इस सन्दर्भ में तात्विक भिन्नता की बात को पहले ही नकारा जा चूका है। जहाँ तक मात्रात्मक भिन्नता का प्रश्न है, तो इसे निम्न परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है:

1.  युगीन परिस्थितियाँ बनाम् परम्परा: जहाँ आचार्य शुक्ल ने भक्ति आन्दोलन की व्याख्या के क्रम में युगीन परिस्थितियों के बहाने इस्लाम की भूमिका पर जोर दिया है, वहीं आचार्य द्विवेदी ने परम्परा की भूमिका पर।

2.  परम्परा की अलग-अलग व्याख्या: यद्यपि परम्परा दोनों के यहाँ मौजूद है, तथापि परम्परा की व्याख्या दोनों अलग-अलग तरीके से करते हैं। आचार्य शुक्ल भक्ति की उस परम्परा को दक्षिण भारतीय आलवारों से सम्बद्ध कर के देखते हैं, तो आचार्य द्विवेदी उस परम्परा की व्याख्या लोक बनाम् शास्त्र के उस द्वंद्व की परिप्रेक्ष्य में करते हैं जो उत्तर भारत में लम्बे समय से चला आ रहा था।

3.  वैष्णव धर्म की स्वाभाविक अभिव्यक्ति बनाम् लोक और शास्त्र के द्वंद्व का परिणाम: आचार्य शुक्ल की नजरों में भक्ति-आन्दोलन वैष्णव धर्म की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है, तो आचार्य द्विवेदी के नजरों में लोक और शास्त्र के द्वंद्व के पृष्ठभूमि में शास्त्र का लोक की ओर झुकने का परिणाम। उनकी नजरों में भक्ति-आन्दोलन लोकधर्म की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है।

4.  ‘पौरुष से हताश जाति की रचना’ वाला सन्दर्भ: आचार्य शुक्ल ने भक्ति आंदोलन को आदिकालीन ऐतिहासिक विकास की प्रक्रिया में रखकर देखते हुए जो बातें की, उससे ऐसा प्रतीत होता है, मानो वे भक्ति-काल को पौरुष से हताश जाति की रचना मान रहे हों; यद्यपि उन्होंने ऐसा स्पष्ट शब्दों में नहीं कहा है। इसके विपरीत, आचार्य द्विवेदी आचार्य शुक्ल की इस धारणा को खारिज करते हुए दृढ़तापूर्वक इस बात की घोषणा करते हैं कि भक्ति-काव्य पौरुष से हताश जाति की रचना नहीं है।

5.  मध्य युगीन टीका-ग्रन्थ अलग-अलग चुनौतियों के परिणाम: आचार्य शुक्ल मध्ययुगीन टीकाओं और भाष्यों को सिद्ध-नाथ संतों की चुनौती के परिपेक्ष्य में रखकर देखते हैं तो आचार्य द्विवेदी इस्लाम के द्वारा प्रस्तुत चुनौती के परिपेक्ष्य में।

उपरोक्त तथ्यों के आलोक में यह निष्कर्ष सहज ही प्रस्तुत किया जा सकता है कि आचार्य शुक्ल न केवल युगीन परिस्थितियों और उसकी भूमिका से वाकिफ हैं, वरन भक्ति की परम्परा की विद्यमानता और इसकी पृष्ठभूमि में भक्ति-आन्दोलन के स्वाभविक विकास की प्रक्रिया से भी उनका परिचय था। आचार्य शुक्ल लोक और शास्त्र के द्वंद्व से भी वाकिफ थे। उन्हें न केवल सिद्ध-नाथ संतो की चुनौती, वरन् उनकी सीमाओं का भी भान था। इस बात की पुष्टि सिद्ध-नाथ संतों के सन्दर्भ में की गई इस टिप्पणी से भी होती है, "सिद्ध एवं नाथ संतो का उद्देश्य कर्म की रूढ़ियों को कर्मकांड की तंग गलियों से निकाल कर प्रकृत धर्म के खुले क्षेत्र में लाना नहीं था। जनता की दृष्टि में आत्म कल्याण और लोक कल्याण विधायक सच्चे कर्मों की और ले जाने के बदले वे उसे कर्म क्षेत्र से ही हटाने में लग गए थे।" आगे वे इसी पृष्ठभूमि में कबीर की ऐतिहासिक भूमिका की ओर इशारा करते हुए कहते हैं, "निस्संदेह, कबीर ने ऐन मौके पर जनता के उस बड़े भाग को सँभाला जो नाथपन्थियों के प्रभाव से प्रेम-भाव और भक्ति-रस से शून्य और शुष्क पड़ता जा रहा था।" मतलब यह कि आचार्य शुक्ल ने लोक के अंतर्विरोधों को भी नोटिस में लिया है और इस ओर इशारा किया है कि भक्ति-आन्दोलन शास्त्र की रूढ़ियों के ही विरुद्ध नहीं है, वरन् यह लोक के रूढ़ियों के भी विरुद्ध है। लेकिन, आचार्य द्विवेदी लोक और शास्त्र के इस द्वंद्व को नोटिस में ले पाने में असमर्थ रहे हैं, अन्यथा आचार्य द्विवेदी के बहाने ‘दूसरी परम्परा की खोज’ करने वाले नामवर सिंह को यह नही लिखना पड़ता, "सामान्य जनता में प्रचलित टोना-टोटकों, तंत्र-मंत्र, मिथक आदि विश्वासों को ही द्विवेदी जी लोक धर्म मानते हैं।" इतना ही नहीं, आचार्य शुक्ल भक्ति-आन्दोलन को भारत की सामासिक संस्कृति के वाहक के रूप में देखते हैं और इसके समावेशी एवं संश्लेषी स्वरूप की ओर इशारा करते हुए लिखते हैं, "अतः मुसलमानों का साम्राज्य स्थापित होने के बाद हिंदुओं और मुसलमानों के समागम से दोनों के लिए जो सामान्य भक्ति मार्ग आविर्भूत हुआ वह अद्वैतवाद रहस्य को लेकर जिसमें वेदांत और सूफी मत दोनों का मेल था।"

मत-भिन्नता के कारण:

अब प्रश्न यह उठता है कि भक्ति-आन्दोलन की व्याख्या के क्रम में आचार्य शुक्ल और द्विवेदी दोनों के मतों में जो भिन्नता उभर कर सामने आती है, उसकी व्याख्या किस परिप्रेक्ष्य में की जा सकती है और उसके कारण क्या हैं? इसे निम्न परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है:

1.  लोक के भिन्न मायने: दरअसल, आचार्य शुक्ल और आचार्य द्विवेदी की साहित्य-दृष्टि में भिन्नता है। आचार्य शुक्ल की साहित्य-दृष्टि के केंद्र में लोक है और यह लोक जनता का पर्याय है जिसमें भारतीय समाज के सभी समूह के लोग शामिल हैं। इतना ही नहीं, उस जनता को लेकर आचार्य शुक्ल दुविधा में रहे हैं। उसमें ‘जनता’ एवं ‘शिक्षित जनता’ का द्वंद्व है जो उनकी पुस्तक ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ की भूमिका में परिलक्षित होता है। इसके पहले संस्करण में वे साहित्य को ‘शिक्षित जनता के ह्रदय का संचित प्रतिबिम्ब’ मानते हैं, तो दूसरे संस्करण में ‘जनता के ह्रदय का संचित प्रतिबिम्ब’। यह इस बात की और संकेत करता है कि आचार्य शुक्ल के मन में गहरे स्तर पर कहीं-न-कहीं शिक्षित जनता के प्रति प्रबल आकर्षण है। यह आकर्षण उनकी व्यावहारिक आलोचना में कवियों एवं रचनाओं के चयन और उनके व्यावहारिक विश्लेषण एवं मूल्यांकन के क्रम में भी परिलक्षित होता है। तुलसी यूँ ही आचार्य शुक्ल के प्रिय कवि और ‘राम चरित मानस’ प्रिय रचना नहीं है।  

इससे भिन्न, आचार्य द्विवेदी की साहित्य-दृष्टि के केंद्र में है लोक, और उनके यहाँ लोक समाज के हाशिए पर के समूह का प्रतिनिधित्व करता है। यह लोक समाज के उस समूह का  प्रतिनिधित्व करता है जो शास्त्र, शास्त्र प्रतिपादित धर्म और शास्त्र प्रतिपादित चिंतन, जिसे सामंती-पुरोहितवादी गठबंधन का संरक्षण मिला है, के हाथों सदियों से शोषण एवं उत्पीड़न का शिकार रहा है।

2.  शास्त्र और लोक की चिन्ताएँ अलग-अलग: जब आचार्य शुक्ल भक्ति-आन्दोलन के आविर्भाव के प्रश्न पर विचार कर रहे होते, तो उनके सामने भक्ति की परम्परा भी मौजूद होती है, लोक एवं शास्त्र का द्वंद्व भी मौजूद होता है और इस्लाम की भूमिका भी मौजूद होती है। इनमें इस्लाम की भूमिका नवीन तत्व के रूप में सामने होती है, जबकि लोक और शास्त्र का द्वंद्व पारम्परिक तत्व के रूप में मौजूद होता। चूँकि आचार्य शुक्ल की साहित्यिक दृष्टि के केंद्र में जो ‘जनता’ है जिसमें समाज के सभी समूह के लोग शामिल हैं, उसकी नज़रों में लोक-शास्त्र के द्वंद्व की तुलना में इस्लाम का आगमन, जिससे समाज की रहनुमाई करने वाले समूह सीधे-सीधे और कहीं अधिक प्रभावित हो रहे थे, कहीं अधिक मायने रखता है। स्पष्ट है कि जब समाज के रहनुमाई करने वाले वर्ग के आलोक में लोक और शास्त्र के द्वंद्व एवं इस्लाम की भूमिका को देखा जाए, तो निश्चय ही इस्लाम के आगमन ने उनकी नियति के निर्धारण में कहीं अधिक अहम् भूमिका निभाई, लोक और शास्त्र की द्वंद्व की तुलना में। यही कारण है कि नवीन तत्व के रूप में इस्लाम का आगमन उन्हें अधिक आकर्षित करता है।

जहाँ तक आचार्य द्विवेदी का प्रश्न है, तो आचार्य शुक्ल की तरह उनके सामने ‘परम्परा’ की भी मौजूदगी थी और इस्लाम की भी मौजूदगी थी। लेकिन, उन्होंने भारतीय समाज के जिस हाशिए पर के समूह को अपने  साहित्यिक चिंतन के केन्द्र में रखा, उसके लिए लोक और शास्त्र का द्वंद्व जीवन-मरण का प्रश्न था। यह प्रश्न उसके अस्तित्व से सम्बद्ध हो गया था। ऐसा नहीं है कि इस्लाम के आगमन ने इस समूह को प्रभावित नहीं किया, लेकिन इस समूह तक यह प्रभाव अपेक्षाकृत देर से पहुँचा। साथ ही, यह समूह अस्तित्व के जिस प्रश्न से जूझ रहा था, उस प्रश्न के सामने इस्लाम का प्रश्न गौण था।

3.  आलोचकीय व्यक्तित्व के निर्माण के भिन्न परिवेश: गाँधीवाद बनाम् वामपन्थ का उभार: यहाँ पर यह प्रश्न सहज ही उठता है कि आचार्य शुक्ल ने अपने साहित्य-चिन्तन के केन्द्र में ‘जनता’ को ही क्यों रखा और अआचार्य द्विवेदी ने ‘लोक’ अर्थात् शोषित-उत्पीड़ित जनता को ही क्यों? दरअसल, आचार्य शुक्ल के आलोचकीय व्यक्तित्व का विकास जिस 1920 के दशक में हुआ, वह दौर गाँधी और गाँधीवाद की बढ़ती हुयी लोकप्रियता का दौर है। उन्होंने उपनिवेशवाद-विरोधी संयुक्त मोर्चे के निर्माण पर जोर दिया और इसकी मजबूती के लिए वर्ग-समन्वय की बात की। इसी के मद्देनजर उन्होंने ट्रस्टीशिप और अछूतोद्धार जैसी संकल्पनाओं को प्रस्तुत किया और राष्ट्रीय आन्दोलन के एजेंडे को समावेशी स्वरुप प्रदान करते हुए उसे जनांदोलन में तब्दील करने का प्रयास किया। फलतः इस दौर में भारतीय समाज के एकल विरोधाभास: औपनिवेशिक हितों एवं भारतीय जनता के मध्य हितों के अंतर्विरोध पर जोर देते हुए भारतीय समाज के आंतरिक विरोधाभास: शोषक और शोषित वर्ग के मध्य हितों के अंतर्विरोध को छुपाया गया। निश्चय ही, इस परिवेश, इसके समक्ष मौजूद चुनौतियों, और उन चुनौतियों के आलोक में तद्युगीन राष्ट्रवादी जरूरतों के साथ-साथ गाँधी एवं गाँधीवाद की लोकप्रियता ने भी आचार्य शुक्ल के आलोचकीय व्यक्तित्व को प्रभावित किया।

इतना ही नहीं, आचार्य शुक्ल की वैष्णव धर्म एवं वैष्णव संस्कारों में गहरी आस्था थी। और इसी आस्था के कारण वे तुलसी के समन्वयवादी चेतना और ‘राम चरित मानस’ में आकार ग्रहण करने वाली उनकी सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टि से वे गहरे स्तर पर प्रभावित थे। उन्होंने सहिष्णुता और समन्वय को भारतीय संस्कृति के मूल्य के रूप में आत्मसात किया। इसीलिए साहित्य को लेकर उनकी सोच भारतीय समाज के हर समूह को ध्यान में रखती है।

इसके विपरीत, आचार्य द्विवेदी के आलोचकीय व्यक्तित्व का विकास जिस 1930-40 के दशक में हुआ, वह दौर वामपंथ की लोकप्रियता का दौर था। वामपंथ ने न केवल राष्ट्रीय आन्दोलन के एजेंडे को बदला, वरन् राष्ट्रीय मुक्ति के प्रश्न को व्यापक सामाजिक-आर्थिक सन्दर्भों से संदर्भित करते हुए सत्ता-परिवर्तन के प्रश्न को व्यवस्था-परिवर्तन के प्रश्न में तब्दील कर दिया। इसके लिए उसने भारतीय समाज के दोहरे विरोधाभास की बात करनी शुरू की: एक, जो औपनिवेशिक हितों और भारतीय जनता के हितों के बीच मौजूद था; और दूसरा, जो भारतीय समाज का आंतरिक विरोधाभास: शोषक और शोषित वर्ग के हितों के बीच था, सामन्तों-जमींदारों और किसानों के हितों के बीच था तथा पूँजीपतियों-उद्योगपतियों और मजदूरों के हितों के बीच था। यही कारण है कि वामपंथ वर्ग-समन्वय की बजाय वर्ग-संघर्ष पर जोर देता है, और द्वंद्व एवं तनाव को छुपाने के बजाय उसे उभारने की हिमायत करता है। आचार्य द्विवेदी वामपंथी तो नहीं थे, लेकिन उनके आलोचकीय व्यक्तित्व पर परोक्षतः ही सही पर वामपंथ की गहरी छाप रही है। यही कारण है कि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी सिद्ध-नाथ संतो से लेकर कबीर की ओर मुखातिब होते हैं, और कबीर की सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टि उन्हें गहरे स्तरों पर प्रभावित करती हैं।

स्पष्ट है कि आचार्य शुक्ल हों या आचार्य द्विवेदी, दोनों के आलोचकीय व्यक्तित्व तदयुगीन राष्ट्रीय जरूरतों और तदयुगीन राष्ट्रीय परिवेश के अनुरूप आकार ग्रहण करते हैं। यहाँ पर इस बात को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि आचार्य द्विवेदी के समय तक आते-आते मार्क्स के 'एशियाटिक मोड ऑफ प्रोडक्शन' की अवधारणा को भी खारिज किया जाने लगा था जो एशियाई समाज में परिवर्तन के आंतरिक तत्वों की बात करता हुआ उसे अगतिशील समाज घोषित करता है। आचार्य द्विवेदी की भक्ति-आन्दोलन की व्याख्या से गुजरते हुए ऐसा महसूस होता है कि वे 'एशियाटिक मॉड ऑफ प्रोडक्शन' का प्रतिवाद करते हुए यह बतलाने की कोशिश कर रहे हों कि भारतीय समाज में परिवर्तन के तत्व: लोक एवं शास्त्र के द्वंद्व के रूप में आंतरिक स्तर पर आरम्भ से ही मौजूद रहे हैं। उनकी नज़रों में, लोक और शास्त्र के बीच का द्वंद्व हजारों वर्षों से चल आ रहा है और इस द्वंद्व ने भारतीय समाज को गतिशील बनाये रखा है।

 

Tuesday, 7 September 2021

भक्ति-आन्दोलन: भारतीय चिन्ताधारा का स्वाभाविक विकास

 

भक्ति-आन्दोलन:

भारतीय चिन्ताधारा का स्वाभाविक विकास

आकस्मिक प्रादुर्भाव का खंडन:

भक्ति-आन्दोलन के सन्दर्भ में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के मतों का निर्धारण ग्रियर्सन और आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के मतों की प्रतिक्रिया में हुआ है आचार्य द्विवेदी ने अपनी पुस्तक ‘हिंदी साहित्य की भूमिका’ में ग्रियर्सन के मत का खंडन करते हुए कहा कि “भक्ति अचानक बिजली के समान नहीं उमड़ी, वरन उसके लिए वर्षो से मेघखंड उपस्थित हो रहे थे।” इस क्रम में उन्होंने भक्ति-आंदोलन के आविर्भाव के संदर्भ में इस्लाम की भूमिका से सम्बंधित आचार्य शुक्ल के मत को खारिज करते हुए इसे ‘इस्लाम की प्रतिक्रिया’ मानने से इनकार किया आचार्य द्विवेदी की नजरों में, भक्ति-आन्दोलन भारतीय चिन्ताधारा का स्वाभाविक विकास है वे लोक और शास्त्र के द्वंद्व के परिप्रेक्ष्य में इसकी व्याख्या करते हुए कहते हैं, “भारतीय पांडित्य ईसा की एक शताब्दी के बाद आचार-विचार एवं भाषा के क्षेत्रों में स्वभावत: ही लोक की ओर झुक गया था।”

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में लोक-शास्त्र द्वंद्व:

आचार्य द्विवेदी के उपरोक्त मत के आलोक में यदि लोक और शास्त्र के द्वंद्व पर विचार किया जाए, तो इस द्वंद्व की जड़ें छठी शताब्दी ईसा पूर्व तक जाती दिखती हैं इस समय तक आते-आते पशुपालक अर्थव्यवस्था का कृषक अर्थव्यवस्था में रूपांतरण हुआ, और फिर इसने कृषि-अधिशेष की संभावनाओं को बल प्रदान किया इसने व्यापार एवं वाणिज्य की संभावनाओं को बल प्रदान किया, और अन्ततः इसकी परिणति ‘दूसरे शहरीकरण’ के रूप में हुई यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें वैदिक धर्म एवं चिंतन से संबंधित मान्यताएँ अप्रसांगिक होने लगीं और बदली हुई सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों में उन्हें पुनर्परिभाषित किए जाने की आवश्यकता महसूस हुई इस काम को किया औपनिषदिक चिंतन ने, वैदिक धर्म और चिंतन के दायरे में रहते हुए और बौद्ध धर्म ने, वैदिक धर्म एवं चिंतन को लाँघ कर

छठी सदी ईसा पूर्व: लोक-शास्त्र द्वंद्व

छठी सदी ईसा पूर्व में औपनिषदिक चिंतन और बौद्ध धर्म ने यज्ञ के दौरान होने वाले कर्मकांड और पशु-बलि का विरोध किया, ताकि कृषक अर्थव्यवस्था की ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए पशुधन के संरक्षण को सुनिश्चित किया जा सके इतना ही नहीं, बौद्ध चिंतन ने तो संघ के भीतर वर्णगत-जातिगत विभेदों को नकारते हुए लोक की आकांक्षाओं एवं अपेक्षाओं की कसौटी पर खरा उतरने का हरसंभव प्रयास करते हुए न केवल आर्थिक एवं सामाजिक प्रगति के बीच सामंजस्य भी बिठाने की कोशिश की और शहरीकरण की ज़रूरतों के अनुरूप खुद को ढ़ालने का प्रयास भी किया यही कारण है कि तदयुगीन जनमानस ने बौद्ध धर्म को हाथों हाथ लिया और उसे राजसत्ता का संरक्षण भी मिला स्पष्ट है लोक और शास्त्र के चिंतन में वैदिक चिंतन औपनिषदिक चिंतन यदि शास्त्र का प्रतिनिधित्व करता है, तो बौद्ध चिंतन लोक का अगर औपनिषदिक चिंतन वैदिक धर्म एवं चिंतन के प्रति सुधारवादी प्रतिक्रिया है, तो बौद्ध चिंतन क्रांतिकारी प्रतिक्रिया  

बौद्ध धर्म के भीतर गहराता लोक-शास्त्र द्वंद्व

मौर्योत्तर काल में ईस्वी सन् तक आते-आते बौद्ध-ब्राह्मण द्वंद्व की पृष्ठभूमि में लोक और शास्त्र के इस द्वंद्व को जोर पकड़ते देखा जा सकता है और ब्राह्मणवाद की पुनर्वापसी की पृष्ठभूमि में बौद्ध धर्म की स्थिति कमजोर पड़ने लगती है। कारण यह कि इस दौर तक आते-आते बौद्ध धर्म का स्वरूप विकृत हुआ। साथ ही, इस दौर में बौद्ध धर्म को राजसत्ता के संरक्षण से वंचित होना पड़ा इस पृष्ठभूमि में शंकराचार्य, कुमारिल भट्ट और उदयन ने ब्राह्मण धर्म की ओर से दार्शनिक दबाव निर्मित करते हुए बौद्ध धर्म को निर्वासन की स्थिति में पहुँचा दिया। मजबूरन बौद्ध धर्म को अपना अस्तित्व बचने के लिए लोक की और उन्मुख होना पड़ा और लोक से जुड़कर अपने लिए नवीन संभावनाओं की तलाश करनी पड़ी यही वह बिंदु है जहाँ लोक और शास्त्र के द्वंद्व ने बौद्ध धर्म के दरवाजे पर दस्तक दिया और लोक को लुभाते हुए उसके करीब पहुँचने की कोशिश में बौद्ध धर्म भक्ति की ओर उन्मुख हुआ और, अन्ततः इसका परिणाम बौद्ध धर्म के हीनयान एवं महायान के विभाजन के रूप में हुआ इसमें हीनयान ने शास्त्रीय बौद्ध धर्म का प्रतिनिधित्व किया, तो महायान ने बौद्ध धर्म के उस रूप का, जो लोक के बीच आकार ग्रहण कर रहा था

सिद्धों-नाथों का आविर्भाव:

यह प्रक्रिया यहीं पर नहीं रुकीसमाज के हाशिए पर के समूह से जुड़ने और उन्हें अपनी ओर आकृष्ट करने के क्रम में बौद्ध धर्म में अनार्य तत्वों के रूप में तंत्र-मंत्र एवं जादू-टोने का प्रवेश हुआ इसके परिणामस्वरूप लोकर्षण के रास्ते पर बढ़ती बौद्ध धर्म की महायान शाखा ने तंत्र-मंत्र की शरण ली, और इन दोनों की क्रिया-प्रतिक्रिया ने वज्रयान संप्रदाय के आविर्भाव का आधार तैयार किया सिद्धों का संबंध इसी वज्रयान शाखा से सम्बद्ध सहजयान सम्प्रदाय से जाकर जुड़ता है सिद्ध संतों के द्वारा पंच-मकारों (मद्य, माँस, मत्स्य, मुद्रा और मैथुन) का सेवन लोक की ओर इनकी उन्मुखता और लोक से उनकी सम्बद्धता का संकेत देता है। इसी सम्बद्धता के कारण उन्होंने लोक की आकाँक्षाओं के अनुरूप हिंदू धर्म और हिंदू सामाजिक व्यवस्था की रुढियों, कर्मकांडों एवं कुरीतियों का विरोध करते हुए वर्णगत-जातिगत भेदभाव के खिलाफ हमलावर तेवर अपनाया

लेकिन, सहजयानी सिद्धो को पंच-मकारों के सेवन और भोग-विलास के दलदल में फँसते देखकर उनके बीच से एक असंतुष्ट समूह का उभार हुआ जिसने सिद्धों से अलग रास्ता अख्तियार करते हुए इन्द्रिय संयम एवं नैतिक शुद्धि पर बल दिया। प्रवृत्तियों के दमन के कारण योग का यह रूप अपेक्षाकृत अधिक कठिन था, इसीलिए इसे हठयोग कहा जाने लगा अन्ततः बौद्ध धर्म, तंत्र-मंत्र और शैव मत की क्रिया-प्रतिक्रिया की पृष्ठभूमि में नाथ-पंथ का आविर्भाव हुआ ये सिद्ध-नाथ संत शास्त्र, शास्त्र-प्रतिपादित धर्म और शास्त्र-प्रतिपादित चिंतन के विरुद्ध लोक की चिन्ताओं एवं आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करते थे आचार्य द्विवेदी के शब्दों में कहें, तो “आठवीं शताब्दी के आसपास पूर्वी भारत, नेपाल और तिब्बत पहुँचकर बौद्ध धर्म का तंत्रवाद से दृढ़तर संबंध स्थापित हुआ, और इसने तंत्र-मंत्र, जादू-टोना और अनुष्ठान के सहारे लोक में आमजन के बीच अपना प्रभाव फैलाया आगे चलकर 9वीं-10वीं शताब्दी में नेपाल की तराई में शैव और बौद्ध-साधनाओं के सम्मिश्रण से नाथ-पंथ का आविर्भाव हुआ।”

ऐसा नहीं है कि शास्त्र, शास्त्र-प्रतिपादित धर्म और शास्त्र-प्रतिपादित चिंतन ने केवल बौद्ध धर्म को ही प्रभावित किया हो सच तो यह है कि जिस दौर में बौद्ध धर्म योग की रुढियों और कर्मकांडों में उलझता दिख रहा था, उसी दौर में शास्त्र-प्रतिपादित धर्म स्मृति-सम्मत वैष्णव धर्म के रूप में खुद का पुनरुद्धार कर रहा था अपने पुनरुद्धार के क्रम में वैष्णव धर्म ने बौद्ध धर्म से अहिंसा के तत्व को ही स्वीकार नहीं किया, वरन् बुद्ध को विष्णु के नौवें अवतार के रूप में भी स्वीकार किया स्पष्ट है कि इस दौर में अगर सिद्ध-नाथ संत लोक के पक्ष का प्रतिनिधित्व करते हैं, तो स्मृति-सम्मत साध्य वैष्णव धर्म शास्त्र के पक्ष का अगर हजारी प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में कहें, तो “ईसा की प्रारंभिक सदी के आसपास बौद्ध धर्म में लोक मत की प्रधानता स्वीकार की और आगे चलकर लोकमत में हुई मिलकर लुप्त हो गया और यह स्थिति बौद्ध धर्म की ही नहीं थी, कमोबेश सभी संप्रदाय की थी जिन्होंने ज्ञानियों एवं पंडितों की आसन से उतरकर लोकमत की ओर आते हुए देखा जा सकता है।”

सगुण-निर्गुण विवाद:

यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें सगुण-निर्गुण विवाद गहराता हुआ दिखाई पड़ा यद्यपि इन दोनों के बीच कोई स्पष्ट विभाजक रेखा नहीं खींची जा सकती है, तथापि यह बात अलक्षित नहीं रह जाती है कि इस पूरे विवाद में निर्गुण लोक के कहीं अधिक करीब दिखाई पड़ता है और सगुण शास्त्र के कहीं अधिक करीब जहाँ निर्गुण हिन्दू-मुस्लिम सांस्कृतिक द्वंद्व को लेकर मुखर है, वहीँ सगुन मौन। निर्गुण संत कबीर ने हिन्दुओं और मुसलमानों के द्वंद्व को सांस्कृतिक धरातल पर अभिव्यक्ति प्रदान की है, तो जायसी ने राजनीतिक धरातल पर। इसने भारत की गंगा-जमुनी तहजीब के निर्धारण में अहम् एवं निर्णायक भूमिका निभायी।  

इसी आलोक में भक्ति-आन्दोलन को भारतीय चिन्ताधारा का स्वाभाविक विकास मानने वाले आचार्य द्विवेदी इस निष्कर्ष के साथ उपस्थित होते हैं, “यदि अगली शताब्दियों में भारतीय इतिहास की अत्यंत महत्वपूर्ण घटना अर्थात इस्लाम का प्रभुत्व विस्तार ना भी घटित होती, तो भी वह इसी रास्ते जाता उसके भीतर की शक्ति उसे इसी स्वाभाविक विकास की ओर ठेले लिए जा रहे थे।” आचार्य द्विवेदी यहीं पर नहीं रुकते अपनी बातों को आगे बढ़ाते हुए वे लिखते हैं, “मैं जोर देकर कहना चाहता हूँ कि यदि इस्लाम नहीं आया होता, तो भी हिंदी साहित्य का स्वरूप बारह आना वैसा ही होता जैसा आज हैमतलब यह कि आचार्य द्विवेदी के यहाँ भी इस्लाम की भूमिका के लिए ‘चार आना वाला स्पेस’ मौजूद है, तभी तो वे इस स्पष्टीकरण के साथ उपस्थित होते हैं, “इन सब का यह अर्थ नहीं कि मुसलमानी धर्म का प्रभाव साहित्य पर नहीं पड़ा, पर प्रभाव को प्रभाव के रूप में ही देखा जाना चाहिए, प्रतिक्रिया के रूप में नहीं इसी प्रभाव की ओर इशारा करते हुए वे लिखते हैं, “इस्लाम के खतरे से अपने धर्म और जाति को बचाने के लिए भारतीय मनीषा जो उस समय कर रही थी, उसी का परिणाम टीका और निबंध ग्रन्थ है

 

Wednesday, 17 March 2021

अब मैं ‘कविता’ नहीं लिखता!

अब मैं ‘कविता’ नहीं लिखता!

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          अब मैं ‘कविता’ नहीं लिखता!

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आज मैं ‘कविता’ नहीं लिखूँगा, और 

लिखूँ भी तो, 

क्यों लिखूँ, 

किसके लिए लिखूँ? 

अपने लिए लिखने की जरूरत नहीं, और 

तुम्हारे लिए मेरे लिखने का कोई मतलब नहीं;

और, बिना मतलब के 

मैं लिख नहीं सकता, 

लिखना नहीं चाहता। 

क्या फ़र्क़ पड़ता है 

कि वहाँ अब मन्दिर बनेगा, 

जहाँ कल तक मस्जिद हुआ करता था, 

जिसके लिए उसी तरह मस्जिद को गिराया गया, 

जिस तरह (शायद) कभी मन्दिर को गिराया गया हो, 

या कि न भी गिराया गया हो, तो 

क्या फ़र्क़ पड़ता है? 

तुम्हारे लिए तो वह इबादत की जगह नहीं, 

वर्चस्व का प्रतीक है, 

बहुसंख्यकों के वर्चस्व का प्रतीक; पर 

मेरे लिए तो वह 

अब भी क़ब्रगाह है इन्सानियत की, 

गाँधी के समावेशी भारत के सपनों की, 

आज़ाद भारत के लोकतंत्र की, 

लोकतांत्रिक संस्थाओं की। 

काश! इस क़ब्रगाह पर खड़े राम 

प्रतीक बन पाते, उस ‘राम’ के, 

जो जन-जन में व्याप्त है, 

जो कण-कण में व्याप्त है, 

जिसे गंगा-जमुनी तहजीब की 

सामूहिक सांस्कृतिक चेतना ने स्वीकारा है, 

जिसे आदिकवि वाल्मीकि से लोकनायक तुलसी तक, और 

राष्ट्रकवि गुप्त से विद्रोही निराला तक ने सँवारा है।

क्या फ़र्क़ पड़ता है 

कि अच्छे दिन आये या नहीं;

क्या फर्क पड़ता है 

कि पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ रही हैं,

या फिर इनमें कमी आ रही है?

क्या फर्क पड़ता है 

कि गरीबी और बेरोजगारी बढ़ रही है, या फिर  

इसमें कमी आ रही है;

क्या फर्क पड़ता है 

कि इंसानियत जिंदा है, या 

हमने उसका सौदा कर लिया, या फिर 

वह मर चुकी है?


क्या फ़र्क़ पड़ता है

कि सार्वजनिक शिक्षा एवं सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था रहे, 

या फिर शिक्षा-स्वास्थ्य को पूरी तरह से निजी आकाओं के हवाले कर दिया जाए?

क्या फ़र्क़ पड़ता है

कि पहले हमने खुद को बेचा 

या फिर हमारे रहनुमाओं ने;

कि पहले हमें हमारे रहनामुओं ने हमें खरीदा,

या फिर हमारे रहनुमाओं को उनके रहनुमाओं ने?


क्या फ़र्क़ पड़ता है 

कि सार्वजनिक रेल और सार्वजनिक बैंक रहें या जाएँ,

बस राजनीति की रेल,

चाहे ‘इसकी’ हो या ‘उसकी’,

पटरी या बेपटरी सरपट दौड़नी चाहिए?

इसीलिए तो ‘फ़र्क़ नहीं पड़ता’

केदार नाथ सिंह के युग का ही मुहावरा नहीं,

मेरे युग का भी मुहावरा है।


शायद यही कारण है

कि अब मैं ‘कविता’ नहीं लिखता,

क्योंकि  

कविता वे लिखते हैं जो जीवित होते हैं; 

कविता लिखने के लिए मरना पड़ता है।

लेकिन, मैं तो मर नहीं सकता,

क्योंकि 

क्योंकि 

मरने के लिए जीवित होना पड़ता है, किन्तु

और जो कुछ भी हो, पर 

मैं जीवित नहीं।

हाँ, मैं जीवित नहीं हूँ

क्योंकि जीवित रहने के लिए 

अहसास चाहिए,

अहसास के लिए संवेदनाएँ चाहिए, और 

अब न तो अहसास शेष हैं और न ही संवेदनाएँ, और

बिना इनके सोचना संभव नहीं। 

सार्त्र ने कहा था:

‘मैं सोचता हूँ, इसलिए मैं हूँ।’, और 

मैं कहता हूँ:

‘मैं नहीं हूँ, क्योंकि मैं नहीं सोचता हूँ।’  

Sunday, 7 October 2018

स्वप्निल घर-बिखरा मकान


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स्वप्निल घर- बिखरा मकान
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घर,
एक सपना;
ऐसा सपना,
जिसे सच करने की शिद्दत से कोशिश,
और करती है उससे दूर;
खुद को पाता
मकान के करीब!
तुम नहीं समझोगे,
कि कैसा होता है घर बनाने का सपना;
और नहीं महसूस कर सकोगे तुम,
सपनों के टूटने का ग़म!
जुस्तजू जिसकी थी
उसे बिखरते देखा,
की समेटने की कोशिश;
पर, हर कोशिश के साथ
अरमान बिखरते गए,
सपने टूटते गए!
तुम क्या जानों,
कितनी लम्बी होती हैं रातें,
सिसकियाँ की,
उपजी हैं जो
अरमानों के बिखरने से!
काश! उन अरमानों को फिर से जिया जा सकता!
अहसासों को समेटा जा सकता,
और फिर कोशिश की जा सकती
घर बनाने के सपने को देखने की,
घर बनाने के सपने को जीने की,
घर को घर के रूप में देखने की शिद्दत भरी चाहनाओं की!
पर, बिखरते अरमान,
टूटते सपने,
बिछुड़ते अपने,
और,
और
घर घर नहीं,
हैं मकान!
यही सच है,
हमारा,
तुम्हारा, और
हम सबका!
पर, विडम्बना यह कि
घर घर तो कभी था ही नहीं,
और मकान बनाने की कभी इच्छा ही नहीं रही।

Saturday, 7 October 2017

मरना (कविता)

मरना,
हो सकता है एक घटना हो आपके लिए;
पर मेरे लिए तो
मरना
एक सतत् प्रक्रिया है।
महज़ शरीर का शेष रहना,
प्राणों का प्रवाह,
साँसों की डोर का बने रहना
जीवन नहीं है मेरे लिए;
और न ही
साँसों का थमना,
प्राणों का छूटना, और
शरीर का शिथिल पड़ना ही
मौत  है मेरे लिए।
मौत है
जीने की वजह का न रह जाना,
मौत है
सपने का शेष नहीं रह जाना!
मौत है
मानवीय संवेदनाओं का लोप,
मौत है
मानव के विवेक पर चोट;
मौत है
उन मूल्यों का अंत,
जो हमें जीने की वजह देते हैं;
मौत है
उन सपनों का अंत,
जिसे पूरा करने को हम तत्पर रहते हैं;
मौत है
अपने स्वत्व को खो देना;
मौत है
भीड़ में तब्दील हो जाना!
मौत होती है तब, जब
ख़ुद को खराद पर चढ़ाना आप बंद कर देते हैं;
मौत होती है तब, जब
खुद को पुनर्परिभाषित करना छोड़ देते हैं!
मौत  होती है तब, जब
आपके शब्द अर्थ खो देते हैं;
मौत होती है तब, जब
आपके ज़ज्बात आपका साथ छोड़ देते हैं;
मौत होती है तब, जब
फ़र्क़ नहीं पड़ता है आपको;
मौत होती है तब, जब
ग़ुस्सा नहीं आता है आपको;
मौत होती है तब, जब
आप हर्ष-विषाद से परे हो जाते हैं;
मौत होती है तब, जब
‘दुलत्ती’ को नियति मान
आप चुप रह जाते हैं;
मौत होती है तब, जब
आप अपमान का घूँट पीकर रह जाते हैं!
मौत कोई सामान्य परिघटना नहीं,
सपनों का न रह जाना ही मौत है,
अपनों का न रह जाना ही मौत है,
ख़ुद का न रह जाना ही मौत है,
सुध का न रह जाना ही तो मौत है!
आँसू जब साथ छोड़ दे,
तो मौत है;
अहसास जब साथ छोड़ दे,
तो मौत है;
मौत हुई ‘होरी’ की,
जब उसने बेटी बेची थी;
मौत हुई ‘धनिया’ की,
जब उसने सुतली की कमाई
दातादीन को सौंपी थी!
मौत मेरी भी होगी,
जब ख़ुद को सौंपूँगा;
मौत मेरी भी होगी,
जब अपना ज़मीर बेचूँगा;
पल-पल मरूँगा, जब
लड़ना छोड़ूँगा;
मौत मेरी भी होगी, जब
खुद से नाता तोड़ूँगा!
मरना तो मुझे भी है, पर
मरूँगा मैं लड़-लड़कर;
जीने की कोशिश करूँगा,
आगे बढ़-बढ़कर;
मरूँगा मैं भी
तिल-तिलकर,
घुल-घुलकर!





Saturday, 23 September 2017

‘दिनकर होने के मायने’

                    ‘दिनकर होने के मायने’
न तो मैंने दिनकर को बहुत पढ़ा है और न ही दिनकर के बारे में बहुत कुछ जानता हूँ, पर उनके बारे में जितना भी जानता हूँ, उसके आधार पर यह कह सकता हूँ कि अगर आज दिनकर होते, तो ‘दिनकरवादियों’ के हाथों अपना हश्र देखकर पीड़ा एवं व्यथा से भर उठते आज के सवर्ण सत्तावादी विमर्श ने जिस तरह दिनकर को हथियाने की कोशिश की है, उसे देख निश्चय ही दिनकर की आत्मा कराह रही होगी। दिनकर को मैनें अबतक जितना जाना और समझा है, दिनकर और चाहे जो हो जाएँ, कम-से-कम वो तो नहीं ही हो सकते। इसकी पुष्टि ‘रश्मिरथी’ की इन पंक्तियों से होती है:
'कौन जन्म लेता किस कुल में? आकस्मिक ही है यह बात,
छोटे कुल पर, किन्तु यहाँ होते तब भी कितने आघात!
स्पष्ट है कि दिनकर एक प्रश्न थे सत्ता एवं व्यवस्था के समक्ष, ऐसे प्रश्न जिसमें उत्तर पाने से कहीं अधिक बेचैनी अपनी गाँठ खोलने की है। यही बेचैनी तो दिनकर को युग-प्रवर्तक कबीर के करीब भी ले आती है और उनके युगनायक प्रेमचंद के करीब भी। और, यही वह बिंदु है जहाँ दिनकर देश एवं काल की सीमा को लाँघ आज के दौर में भी अपनी प्रासंगिकता सिद्ध करते हुए आते हैं। आज के विमर्श में, जबकि हम वाम और दक्षिण के बीच बँटकर रह गए हैं और बीच का स्पेस समाप्त हो चुका है, ऐसे समय में दिनकर की ये पंक्तियाँ हमें चेताती हैं:
दहक रहे भीषण क्षुधाग्नि से, जिनके प्राण अभागे
निर्दय है दर्शन पड़ोसता है, जो उसके आगे;
रोटी दो, मत उन्हें दर्शन दो, जिनको भूख लगी है,
भूखों को दर्शन देना, छल है, दगा, ठगी है!
शायद बाबा नागार्जुन और निराला को छोड़ हिन्दी साहित्य में दिनकर के अलावा ऐसा दूसरा कवि नहीं मिलेगा जिसे पचा पाना किसी धारा के वश में न हो  सीलिए मैनें कहा कि दिनकर प्रश्न हैं व्यवस्था के समक्ष, जिसे बर्दाश्त कर पाना किसी भी सत्ता एवं व्यवस्था के लिए मुमकिन नहीं है। दिनकर स्वयं भी इस बात से वाकिफ थे, इसीलिए वे इसका संकेत देते हुए कहते हैं कि:
दिनकर केवल प्रश्न उठता है,
समाधान की बात न कोई पास,
मूढ़ समस्याओं का केवल दास।
अब, यह प्रश्न सहज ही उठता है कि दिनकर क्यों केवल प्रश्न उठता है, तो इसका जवाब भी उनके यहाँ मौजूद है:
जो कुछ खुलता सामने, समस्या है केवल,
असली निदान पर वज्र के ताले हैं,
उत्तर शायद हो छुपा, मूकता के भीतर,
हम तो प्रश्नों का रूप सजाने वाले हैं!
क्या यह सच नहीं कि दिनकर की इन पंक्तियों से गुजरते हुए हमें ऐसा महसूस होता है कि यह दिनकर के युग का सच हो अथवा नहीं, पर उससे बड़ा सच हमारे युग का है? दिनकर अपने युग के सच से साक्षात्कार का ही दूसरा नाम है। दिनकर ने लिखा भी है: “मैं तो समय का पुत्र हूँ और मेरा सबसे बड़ा कार्य यह है कि मैं अपने युग के क्रोध और आक्रोश को, अधीरता और बेचैनियों को सबलता के साथ छंदों में बाँध सबके सामने उपस्थित कर सकूँ।” ‘आग की भीख’ कविता में इसी अधीरता और बेचैनी को अभिव्यक्ति देते हुए उन्होंने लिखा है:  
    
बेचैन है हवायें, सब ओर बेकली है
कोई नहीं बताता किश्ती किधर चली है।
मँझधार है, भँवर है या पास किनारा?
यह नाश आ रहा है या सौभाग्य का सितारा?
यह तस्वीर है दिनकर के समय से कहीं अधिक आज के भारत की क्या यह सच नहीं कि आज का भारत खुद को एक ऐसे दोराहे पर खड़ा उन प्रश्नों से जूझ रहा है जिनके उत्तर से उसका भविष्य निर्धारित होगा? आज वही भारत खुद को असहिष्णुता के रास्ते पर बढ़ते देखने के लिए अभिशप्त है जिसकी बुनियाद ही सहिष्णुता और समन्वय पर टिकी है भारत की विडम्बना यह कि जहाँ पर इसे असहिष्णु होना चाहिए, वहाँ इसकी सहिष्णुता घुन की तरह इसे खोखला कर रही है और जहाँ पर इसे सहिष्णु होना चाहिए, वहाँ पर इसकी असहिष्णुता इसकी बुनियाद को हिला रही है ऐसे समय में जब ‘आईडिया ऑफ़ इंडिया’ अर्थात् ‘भारत की संकल्पना’ को लेकर टकराव अपने चरम पर है, दिनकर और उनके ‘संस्कृति के चार अध्याय’ की प्रासंगिकता से कौन इन्कार कर सकता है वरिष्ठ आलोचक नामवर सिंह ने इसके वैशिष्ट्य की दिशा में संकेत करते हुए लिखा है: “दिनकर भारत के सच्चे लोकतंत्र के चिंतक थे उनकी लिखी किताब 'संस्कृति के चार अध्याय' भारत की सामासिक संस्कृति का ग्रंथ है, न कि हिंदू संस्कृति का” एक ऐसे दौर में, जब हिन्दू और हिंदुत्व राष्ट्र एवं राष्ट्रवाद के पर्याय के तौर पर प्रस्तुत किये जा रहे हैं और हम इस लड़ाई को ‘वाम बनाम् दक्षिण’ की लड़ाई मानकर हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं, दिनकर की यह पंक्ति हमें उत्प्रेरित करती है तटस्थता तोड़ने के लिए:
'समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध,
जो तटस्थ है, समय लिखेगा उसका भी अपराध
'
दिनकर यही कहकर चुप्पी नहीं धारण कर लेते, वरन् एक कदम आगे बढ़कर स्पष्ट शब्दों में इस बात की घोषणा करते हैं:
छीनता हो स्वत्व कोई और,
तू त्याग-तप से काम ले यह पाप है,
पुण्य है विच्छिन्न कर देना उसे,
बढ़ रहा तेरी तरफ जो हाथ है
और इस क्रम में होने वाली हिंसा के लिए जिम्मेवार कौन है, होने वाली अपार जन-धन की हानि के लिए जिम्मेवार कौन है; तो इसका जवाब भी दिनकर ही देते हैं:
चुराता न्याय को जो, रण को बुलाता वही है;
युधिष्ठिर, सत्य की अन्वेषणा पातक  नहीं है
एक ऐसे दौर में, जब कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर तक अशांत है और आधा भारत वामपंथी उग्रवाद की चुनौतियों से निबटने में खुद को असमर्थ महसूस कर रहा है तथा सत्ता अपनी विफलता एवं अपनी जिम्मेवारियों की परवाह किये बगैर बन्दूक की नोंक पर शांति की स्थपना के लिए प्रतिबद्ध प्रतीत हो रही है, दिनकर की ये पंक्तियाँ आजाद भारत के रहनुमाओं के लिए चुनौती बनकर सामने आ रही है:
जब तक मनुज मनुज का यह सुख भाग नहीं सम होगा,
शमित न होगा कोलाहल संघर्ष नहीं कम होगा
यही वे परिस्थितियाँ रहीं होंगीं जिन्होंने दिनकर को यह लिखने के लिए विवश किया होगा:
सदियों की ठंढी-बुझी राख सुगबुगा उठी,
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है,
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन ख़ाली करो कि जनता आती है।
यह उद्घोष है राष्ट्रकवि का। आज अगर दिनकर होते, तो शायद ऐसा लिखने का साहस कर पाना उनके लिए मुश्किल होता; और अगर ऐसा लिखते, तो आज की सत्ता और आज की मीडिया उन्हें भी देशद्रोही घोषित करने में पल भर की देर नहीं लगाती। आज राष्ट्र और राष्ट्रवाद के नाम पर होने वाले विमर्श में दिनकर कहाँ पर खड़े हैं, इसके संकेत 1955 में लिखे उनके लेख ‘शांति की समस्या’ के इस उद्धरण से मिलते हैं:

प्रत्येक देश की वैश्विक नीति, उसके राष्ट्रीय चरित्र की परछाईं होती है हमारा राष्ट्रीय चरित्र योद्धा नहीं, शांति-सेवक का रहा है...भारत नाम में जो दिव्यता है, उसके प्रतीक यहाँ अर्जुन नहीं, युधिष्ठिर रहे हैं; चंद्रगुप्त नहीं अशोक रहे हैं... आनेवाला विश्व सिकंदर और हिटलर का विश्व नहीं, बुद्ध, ईसा, गांधी और जवाहर का संसार होगा’’
दिनकर की ये पंक्तियाँ सन्देश हैं उन लोगों के लिए, पाकिस्तान और चीन के बिना जिनकी राष्ट्रवादी चेतना की कल्पना नहीं की जा सकती है तथा जिनकी राष्ट्रवादी चेतना सडकों पर एवं सोशल मीडिया से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तक में छलकती रहती है अगर दिनकर की पुण्य-तिथि को लेकर हम वाकई गंभीर हैं, तो हमें दिनकर के आदर्शों का अनुकरण करना चाहिए दिनकर का राष्ट्रवाद न तो नस्लवाद के पर आधारित था और न ही किसी खास धर्म के विरोध में। दरअसल यह किसी भी प्रकार की प्रभुत्ववादी मानसिकता के विरोध में खड़ा था। इसके मूल में घृणा की बजाय प्रेम है और यह
“सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामया;
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चित् दु:खभाग्भवेत्।”
के आदर्शों से अनुप्राणित होने के कारण सांस्कृतिक मानवतावाद के धरातल पर खड़ा है। इसीलिए यह शोषित-उत्पीड़ित वर्गों की पीड़ा के प्रति संवेदनशील है। प्रमाण है 'रेशमी नगर' दिल्ली के नेताओं पर उनका यह व्यंग्य:
'रेशमी कलम से भाग्य-लेख लिखने वालो,
तुम भी अभाव से कभी ग्रस्त हो रोये हो क्या?
यह कोई कोरा सांस्कृतिक राष्ट्रवादनहीं है, जहाँ विद्रोह, बदलाव और अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक बुराइयों की आलोचना-प्रत्यालोचना के लिए कोई जगह नहीं है, तभी तो दिनकर समर निंद्य हैमें स्पष्ट शब्दों में घोषित करते हैं:
शांति खोलकर खड्ग क्रांति का जब वर्जन करती है,
तभी जान लो, किसी समर का वह सर्जन करती है
दिनकर में जो बेलाग कथन की यह शैली है, यही उन्हें युग की आवाज़ में तब्दील कर देती है; तभी तो वे यह कहने का साहस जुटा पाते हैं:
'सुनूँ क्या सिन्धु! मैं गर्जन तुम्हारा
स्वयं युगधर्म का हुँकार हूँ मैं!
वे यहीं पर नहीं रुकते। एक कदम आगे बढ़ते हैं और घोषित करते हैं कि:
दबी-सी आग हूँ भीषण क्षुधा का
दलित का मौन हाहाकार हूँ मैं
सजग संसार, तू निज को सम्हाले
प्रलय का क्षुब्ध पारावार हूँ मैं
शायद यही कारण है कि दिनकर जीवन-पर्यंत किसी एक खूँटे से बंधकर नहीं रहे; चाहे वह व्यक्ति हो, या फिर विचारधारा। उन्होंने जनहित और राष्ट्रहित को सर्वोपरि महत्व प्रदान किया, और इनमें भी “सबरि ऊपर मानुस-सत्य”:
श्रेय उसका प्राण  में बहती प्रणय की वायु ,
मानवों के हेतु अर्पित मानवों की आयु ।
श्रेय होगा धर्म का आलोक वह निर्बंध,
मनुज जोड़ेगा मनुज से जब उचित सम्बन्ध।
स्पष्ट है कि दिनकर कल भी प्रासंगिक थे, आज भी हैं और कल भी रहेंगे; पर उनके लिए, दिनकर के मूल्यों, सिद्धांतों एवं आदर्शों में जिनकी आस्था है; उनके लिए नहीं, जो ‘दिनकर के नाम’ पर दिनकर की राजनीति करते हैं। शायद यही कारण है कि आलोचकीय अनिच्छा के बावजूद जनता ने दिनकर को 'राष्ट्रकवि' के रूप में स्वीकारा और राष्ट्रकवि-सा स्नेह एवं प्रेम दिया। इसी प्रेम का नतीजा है कि ज्ञानपीठ सम्मान सहित हिन्दी के तमाम महत्वपूर्ण सम्मान एवं पुरस्कार मिलने के बावजूद हमें इस बात का मलाल होता और ऐसा लगता है कि दिनकर साहित्य-जगत् में जिस सम्मान के हकदार थे, वह सम्मान उन्हें नहीं मिल पाया