Friday, 24 September 2021

दिनकर केवल प्रश्न उठाता है! (दिनकर जयन्ती पर विशेष)

 

“दिनकर केवल प्रश्न उठाता है!”

वाम और दक्षिण के दायरे से पर दिनकर

दिनकर की मूलवर्ती चेतना मानवतावादी:

कल अर्थात् 23 सितम्बर को राष्ट्रकवि दिनकर की जयंती थी, उस दिनकर की जयंती, राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त जिनके काव्य-गुरु थे और जिन्होंने गुप्त जी की रचनाओं से प्रेरणा ली। लेकिन, दिनकर मानवतावादी पहले थे, राष्ट्रवादी बाद में। और, इस बात को स्वीकारने से दिनकर स्वयं भी नहीं हिचकते: "राष्ट्रीयता मेरे व्यक्तित्व के भीतर से नहीं जन्मी है, उसने बाहर से आकर मुझे आक्रांत किया है" मतलब यह कि अगर तद्युगीन औपनिवेशिक भारत की ज़रूरतों ने दिनकर को राष्ट्रवादी बनाया, तो उनकी मानवतावादी चेतना उनके अन्तःव्यक्तित्व से उपजी हुई है जिसके मूल में ‘एक मनुष्य होने का भाव’ अन्तर्निहित है। ‘मनुष्य होने के इसी भाव’ ने दिनकर को राष्ट्रवादी भी बनाया और अंतर्राष्ट्रवादी भी। और, इसी भाव ने इन्हें इस या उस विचारधारा से बँधने नहीं दिया। इसी भाव के कारण गाँधी और गाँधीवाद भी दिनकर को बाँध नहीं पाता। जैसे ही उन्हें ज़रुरत महसूस होती है, वे इसके दायरे को लाँघते हुए आगे बढ़ जाते हैं:

रे, रोक युधिष्ठिर को न यहाँ,
जाने दे उनको स्वर्ग धीर,
पर, फिरा हमें गाण्डीव-गदा,
लौटा दे अर्जुन-भीम वीर।

यहाँ पर युधिष्ठिर पर अर्जुन एवं भीम को और ‘कुरुक्षेत्र’ में युधिष्ठिर की तुलना में भीष्म को तरजीह कहीं-न-कहीं गाँधी और गाँधीवाद से उनकी बढ़ती दूरी की ओर इशारा करती है। दरअसल गाँधीवाद जिस बदलाव की बात करता है, बदलाव की वह प्रक्रिया क्रमिक एवं धीमी होने के कारण उबाऊ और थकाऊ है। इसने कहीं-न-कहीं दिनकर को गाँधी एवं गाँधीवाद से दूर ले जाने का काम किया। इसकी तुलना में त्वरित परिवर्तन की चाह ने उन्हें वैकल्पिक संभावनाओं की तलाश के लिए उत्प्रेरित किया। इसी चाह में वे अपनी इस आकांक्षा को प्रकट करते हैं:

कह दे शंकर से, आज करें
वे प्रलय-नृत्य फिर एक बार।

यही आकांक्षा उन्हें मार्क्स और मार्क्सवाद की ओर ले जाती है, और ‘अच्छे लगते हैं मार्क्स’ के ज़रिये वे इसके प्रति अपने आकर्षण की ओर इशारा करने से वे चूकते नहीं हैं:

अच्छे लगते मार्क्स, किंतु है अधिक प्रेम गाँधी से;

प्रिय है शीतल पवन, प्रेरणा लेता हूँ आँधी से।

नहीं चाहता युद्ध-लड़ाई, लेकिन यदि ठनेगी;

शान्तिवाद से मेरी एक नहीं बनेगी।

एक नहीं, हैं दोनों ध्रुव, मेरे भीतर धँसे हुए,

सभी सत्य अपने-अपने शिखरों पर हैं बसे हुए।

इस सन्दर्भ में दिनकर की डायरी इशारतन ही सही, उनके बारे में बहुत कुछ संकेत करती है। 3 फरवरी,1970 को वे लिखते हैं: “विचार की स्वतंत्रता की रक्षा करना दर्शन का कर्तव्य है, इसलिए तानाशाह गद्दी पर आते ही दर्शन को मार डालते हैं।” आगे 23 अप्रैल ,1970 को लेलिन की पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए उन्होंने लिखा: “जो क्रान्ति सन् 1917 ईस्वी के अक्टूबर महीने में रूस में हुई, वह मनुष्य के इतिहास की सबसे बड़ी क्रांति थी और कोई आश्चर्य नहीं कि उसका प्रभाव सारे संसार पर पड़ा है। इस महाक्रान्ति के निर्माता और संचालक महात्मा लेनिन थे। वे संसार भर के गरीबों को यह सिखाने आए थे कि गरीबी भाग्य का परिणाम नहीं है। वह दूर की जा सकती है, समाज का तख्ता उल्टा जा सकता है और क्रान्ति के द्वारा वे लोग अपदस्थ किए जा सकते हैं, जो हर जगह गरीबों का शोषण करके मौज मजे की जिंदगी बशर कर रहे हैं। ... उन्होंने केवल क्रान्ति ही नहीं की, क्रान्ति को विज्ञान बना दिया।” इससे पूर्व, 9 मार्च, 1970 को लिखी गयी कविता ‘लेनिन’ में उनका यह आकर्षण अपने चरम् पर पहुँचता दिखता है। लेनिन को संबोधित इस कविता में वे लिखते हैं:

“लेनिन! आपसे मिलने के पूर्व

मैं गाँधी से मिला था।

गाँधी अंग-अंग में मंद-मंद लगने वाली शीतल बयार थे।

आप तो तूफान और आँधी थे।

पहाड़ों से आपने झुकने को भी

नहीं कहा,

धक्का मारा और सीधे

उन्हें जड़ से उखाड़ दिया।

साँप और साँप के बच्चे,

दोनों को

जमीन के नीचे गाड़ दिया।

लेनिन, आपने अगर भारत में जन्म लिया होता,

हम आपको कल्कि का अवतार मानते।”

यह आकर्षण उनमें अन्त-अन्त तक बना रहा लेकिन, न तो भारतीय वामपंथियों द्वारा गाँधी की छीछालेदर, बुर्जुआ कहते हुए उन पर पूँजीवाद एवं पूँजीपतियों के पृष्ठ-पोषण का आरोप और इसके माध्यम से उनके चरित्र-हनन की कोशिश दिनकर को रास आयी और न ही वामपंथियों की आकाशजीविता, जिसके कारण वे अक्सर भारत की कीमत पर सोवियत संघ एवं चीन की पैरोकारी करते नज़र आते थे। उन्होंने मार्क्स के बहाने ऐसे मार्क्सवादियों की जमकर खबर ली है:

कह दो मार्क्स से, डरे हुओं का गाँधी चौकीदार नहीं,

सर्वोदय का दूत किसी संचय का पहरेदार नहीं

दिनकर उस समय भी गाँधी की रक्षा की खातिर गाँधी के साथ खड़े हुए, जब सन् 1962 में भारत पर चीनी हमले ने उस राष्ट्रीय सांस्कृतिक अस्मिता को दाँव पर लगा दिया था जिसके लिए गाँधी ने अपनी जान की बाज़ी लगा दी थी। ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ में उन्होंने लाल चीन को आड़े हाथों लेते हुए लिखा:

किसे लीलने को आयी यह लाल लपट है?
गाँधी पर यदि नहीं, और किस पर संकट है?

यही वह प्रश्न था जिसने भारतीय वामपंथ को दो धड़ों में विभाजित कर दिया था: एक धड़ा देश के साथ खड़ा था, तो दूसरा धड़ा देश के विरुद्ध। उसकी सहानुभूति और संवेदना चीन के साथ थी। ऐसे समय में जगे हुए दिनकर भारतीय जनमानस को जगाने का काम करते हैं। वे भारतीय जनमानस का आह्वान करते हुए कहते हैं:   

रुधिर में रखे शीत या ताप?
अहिंसा वर है अथवा शाप?
युद्ध है पुण्य याकि दुष्पाप?
आज सारा विवाद त्यागो।
गाँधी की रक्षा करने को गाँधी से भागो।

भारतीयता के प्रति घोषित प्रतिबद्धता:

दरअसल दिनकर न तो गाँधी को पूरी तरह से छोड़ पाए और न ही मार्क्स को पूरी तरह से अपना ही पाए। ऐसा संभव भी नहीं था, दिनकर भारतीयता से ओत-प्रोत जो थे। भारतीयता उनकी नसों में समायी हुई थी जिसकी घोषणा से उन्हें परहेज़ भी नहीं था:

पता मेरा तुझे मिटटी कहेगी,

समा जिसमें चुका सौ बार हूँ मैं!

इसीलिए तो उनकी जन्मशती समारोह के अवसर पर डॉ. कर्ण सिंह ने कहा, "दिनकर न सिर्फ़ हिन्दी के, बल्कि भारतीय साहित्य के प्रतिष्ठित रचनाकार हैं जब भी भारतीय साहित्य का इतिहास लिखा जाएगा तब उनका नाम स्वर्णक्षरों में लिखा जाएगा" उनकी भारतीयता वाली इसी पहचान को रेखांकित करते हुए प्रसिद्ध आलोचक डॉ. नामवर सिंह ने कहा, “इसीलिए तो दिनकर भारत के सच्चे लोकतंत्र के चिंतक थेउनकी लिखी किताब 'संस्कृति के चार अध्याय' भारत की सामासिक संस्कृति का ग्रंथ है, न कि हिंदू संस्कृति का।” इसीलिए फिरकापरस्त ताकतें, चाहे वैचारिक हो अथवा धार्मिक-सांप्रदायिक, उनके लिए दिनकर को पचा पाना संभव नहीं है:

मची मुहर्रम घर में जिसके,

यह उसकी होली कैसी?

श्याम नहीं हैं, फिर

ब्रज-बालाओं की रंग-रोली कैसी?

भारतीय राष्ट्रवाद की संकल्पना:

राष्ट्रकवि दिनकर के लिए राष्ट्र न तो कोई ज़मीन का टुकड़ा था और न ही पश्चिम की तरह ‘एक भाषा, एक जाति, एक धर्म’ पर आधारित। इसके विपरीत, वह भारतीय समाज एवं संस्कृति की विविधता के अनुरूप आकार ग्रहण करता है। वह सर्वधर्मसमभाव का समवेत रूप है और उसे वे मानवीय चेतना से भी लैस करते हैं, तभी तो वे लिखते हैं:

माँगो, माँगो, वरदान धाम चारों से,

मंदिरों, मस्जिदों, गिरजों, गुरुद्वारों से।

लेकिन, यहाँ पर इस बात को ध्यान में रखा जाना चाहिए कि आज के तथाकथित धर्मनिरपेक्षतावादियों के विपरीत दिनकर सेलेक्टिविज्म के शिकार नहीं थे। संस्कृति के चार अध्यायमें लिखते हैं: “हिन्दू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा देने के लिए इतिहास की घटनाओं पर पर्दा नहीं डाला जा सकता। न यही योग्य है कि हम इस्लाम पर पड़ने वाले हिन्दू प्रभाव अथवा हिन्दुत्व पर पड़नेवाले मुस्लिम प्रभाव को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करें। जो बातें जैसी हैं, इतिहास में उनका वर्णन वैसा ही रहेगा।”

दक्षिणपंथी राष्ट्रवाद को खारिज करना:

दिनकर ने राष्ट्र को एक ऐसी सांस्कृतिक संकल्पना के रूप में देखा जो अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम् उदारचरितानां तू वसुधैव कुटुम्बकम्।।’ की अवधारणा से प्रेरित है। इसीलिए वह साम्राज्यवाद और फासीवाद के रूप में पश्चिमी राष्ट्रवाद की परिणति का निषेध करती हुई एक ओर अंतर्राष्ट्रवाद की संभावनाओं को समाहित करती है, दूसरी ओर खुद को गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर, गाँधी और नेहरु की अपेक्षाओं के अनुरूप ढ़ालती हुई व्यापक मानवतावादी चेतना के धरातल पर खड़ी होती है। आज भारत में राष्ट्रवाद के नाम पर जो खेल खेला जा रहा है, दिनकर उस खेल से वाकिफ़ थे, इसीलिए ‘कुरुक्षेत्र’ के आरंभ में ही उस पर जोरदार हमला बोलते हुए उन्होंने लिखा है:

वह कौन रोता है वहाँ,

इतिहास के अध्याय पर,

जिसमें लिखा है नौजवानों के लहू का मोल है।

जिसका हृदय उतना मलिन, जितना कि शीर्ष वलक्ष (श्वेत) है।

जो आप तो लड़ता नहीं,

कटवा किशोरों को मगर,

आश्वस्त हो कर सोचता,

शोणित बहा, लेकिन गई बच लाज सारे देश की।

वामपंथियों से भिन्नता:

राष्ट्रवाद को लेकर दिनकर अपने समय के वामपंथियों से भिन्न लाइन लेते हैंउन्होंने औपनिवेशिक भारत की ज़रूरतों के अनुरूप इस बात को समझा कि राष्ट्रवाद पराधीन देश की ज़रुरत है जबतक राष्ट्र और राष्ट्रवाद के प्रश्न का समाधान नहीं हो जाता, तबतक मानवता से सम्बद्ध प्रश्नों का समाधान संभव नहीं है और जबतक ऐसा संभव नहीं है, तबतक मानव और मानवता का कल्याण संभव नहीं है

राष्ट्रवाद के अंतर्विरोध:

उन्होंने इस बात को भी समझा कि अपने अंतर्विरोधों के कारण राष्ट्रवाद के प्रश्न का समाधान स्वयमेव मानवता के प्रश्न के समाधान के मार्ग को प्रशस्त नहीं कर सकता है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि वे राष्ट्रवाद के अंतर्विरोधों से भी अच्छी तरह वाकिफ थे:

हो रहे खड़े आजादी को हर ओर दगा देनेवाले,

पशुओं को रोटी दिखा उन्हें फिर साथ लगा लेनेवाले

यही कारण है कि उन्होंने सत्ता-परिवर्तन के प्रश्न तक सीमित रहने के बजाय व्यवस्था-परिवर्तन के प्रश्न को उठाया इसी कारण प्रेमचन्द की तरह दिनकर भी इस बात को लेकर आशंकित थे कि अगर भारत ने आजादी हासिल कर भी ली, तो क्या भूख, अभाव, गरीबी और बेकारी से बदहाल भारत अपनी आजादी की रक्षा कर पायेगा? उन्होंने भारत की आज़ादी की पृष्ठभूमि में लिखी कविता ‘रोटी और स्वाधीनता’ में अपनी इस आशंका को अभिव्यक्ति देते हुए लिखा:

आजादी तो मिल गई, मगर, यह गौरव कहाँ जुगाएगा?

मर भूखे इसे घबराहट में, तू बेच न तो खा जाएगा?

और, इसीलिए जब राष्ट्रवाद और मानवतावाद के प्रश्न टकरा रहे होते हैं, तो दिनकर घोषित रूप से मानवतावाद की हिमायत करते हुए उसके पक्ष में खड़े होते हैं:

आजादी रोटी नहीं, मगर दोनों में कोई वैर नहीं

पर, कहीं भूख बेताब हुई, तो आजादी की खैर नहीं

किसान परिवार की पृष्ठभूमि से आने वाले दिनकर ने भूख के प्रश्न से आगे बढ़कर भारतीय किसानों की दुर्दशा का चित्रण करते हुए लिखा है:

जेठ हो कि हो पूस, हमारे कृषकों को आराम नहीं है,

छूटे कभी संग बैलों का, ऐसा कोई याम नहीं है।

मुख में जीभ, शक्ति भुजा में, जीवन में सुख का नाम नहीं है,

वसन कहाँ, सूखी रोटी भी मिलती दोनों शाम नहीं है।

वे स्वतंत्र भारत के रहनुमाओं को अपने इस प्रश्न के ज़रिये संवेदित करने की कोशिश करते हैं:

'रेशमी कलम से भाग्य-लेख लिखने वालो,

तुम भी अभाव से कभी ग्रस्त हो रोये हो क्या?

लेकिन, सत्ता के मद में मदमस्तों को इन सबसे कहाँ फर्क पड़ने वाला? इसलिए वे सवाल-जवाब पर उतरते हुए उनसे तीखे सवाल करते हैं:

सबके भाग्य दबा रक्खे हैं, किसने अपने कर में?

उतरी थी जो विभा, हुई बंदिनी, बता किस घर में?

व्यवस्था के रहनुमाओं से किया गया उनका यह प्रश्न आज भी प्रासंगिक है, लेकिन आजादी की विडंबना यह है कि चौहत्तर साल बीतने के बाद भी यह प्रश्न अनुत्तरित है। और, आलम यह है कि कम-से-कम दिनकर के समय प्रश्न करने के जोखिम कम थे, इसलिए प्रश्न किये जा सकते थे। पर, आज हमारे रहनुमाओं को इन प्रश्नों से परहेज़ है। सवाल और सवाल करने वाले उन्हें रास नहीं आते हैं, इसीलिए वे दोनों को कटघरे में खड़ा कर देते हैं और हिन्दुत्व एवं राष्ट्रवाद के कॉकटेल लेकर मदमस्त जनता तालियाँ पीट रही है। जनता का यह रवैया दिनकर को हताश और निराश करता है, और वे अपनी निराशा एवं हताशा को अभिव्यक्ति देते हुए कह उठते हैं:

बेचैन है हवायें, सब ओर बेकली है
कोई नहीं बताता, किश्ती किधर चली है।
मँझधार है, भँवर है, या पास किनारा?
यह नाश आ रहा है, या सौभाग्य का सितारा?

उनकी इस बेचैनी और बेकली को राष्ट्रीय सन्दर्भों के साथ-साथ उनके व्यक्तिगत जीवन के सन्दर्भों में भी देखा जाना चाहिए राष्ट्रकवि दिनकर के जीवन में सम्मान की तो कमी नहीं रही, पर अर्थाभाव का दंश उन्हें झेलना पड़ा और उस दंश को असहनीय बनाया उनके परिजनों के रवैये ने। इसका संकेत उनके उस पत्र में मिलता है जिसे उन्होंने 14 अगस्त, 1953 को अपने अन्तरंग मित्र को लिखा था और जो सन् 2008 में दिनकर की जन्मशती पर एक पत्रिका के विशेषांक में प्रकाशित हुआ। प्रेम कुमार मणि ने अपने पोस्ट में इसका विस्तार से उल्लेख किया है। इस पत्र में वे लिखते हैं: “ज़िन्दगी में पहले-पहल कर्ज़दार होना पड़ा है क़र्ज़ पाप है और उस से प्रतिभा कुंठित हो जाती है।” उनकी पीड़ा सिर्फ इतनी नहीं है। वे एक ओर मैथिली शरण गुप्त और रामवृक्ष बेनीपुरी जैसे साहित्यकार मित्रों से परेशान थे, दूसरी ओर जाति की राजनीति के कारण विषाक्त होते बिहार के सांस्कृतिक वातावरण से। आज का माहौल इससे बहुत अलग नहीं है

ऐसे माहौल में उनका मन आशंकित हो उठता है और आशंकित मन सुकून की तलाश प्रश्नों का आश्रय लेता है:

धुँधली हुईं दिशाएँ, छाने लगा कुहासा
कुचली हुई शिखा से आने लगा धुआँ-सा। 
कोई मुझे बता दे, क्या आज हो रहा है
मुँह को छिपा तिमिर में क्यों तेज रो रहा है

दिनकर का यह प्रश्न आज भी प्रासंगिक है, लेकिन हमारे रहनुमाओं को इस प्रश्न का उत्तर देने से परहेज़ है इसीलिए उत्तर कल भी नदारद था और आज भी नदारद है वे उत्तर देने की बजाय प्रश्न करने वालों को ही निराशावादी साबित करने पर तुले हुए हैं। ऐसे में दिनकर एक बार फिर से अपने इस प्रश्न के साथ उपस्थित होते हैं:

क्या कहा कि मैं घनघोर निराशावादी हूँ?
तब तुम्हीं टटोलो हृदय देश का, और कहो!

मानवोचित सम्बंधों की वकालत:

मानवतावाद की यही हिमायत दिनकर को वामपन्थ के करीब ले आती है, लेकिन इस बात को ध्यान में रखा जाना चाहिए कि अगर दिनकर का रुझान वामपन्थ और समाजवाद की ओर था भी, तो यह रुझान संवेदना के धरातल पर कहीं अधिक परिलक्षित होता है और वह भी मानवीय सरोकारों के कारण, और वहीं तक जहाँ तक यह मानवीय संवेदना के अनुरूप है। इसी मानवीय संवेदना को वे मनुज का श्रेय बतलाते हैं:

श्रेय होगा धर्म का आलोक वह निर्बंध,

मनुज जोड़ेगा मनुज से, जब उचित संबंध

श्रेय उसका प्राण में बहती प्रणय की वायु,

मानवों के हेतु अर्पित मानवों की आयु

दिनकर की रचनाएँ मनुज और मनुज के बीच इसी उचित संबंधों की तलाशती हैं। इसी उचित सम्बन्ध की तलाश उन्हें विभिन्न विचारधारों की वैचारिक यात्रा पर भी ले जाता है और ज़रुरत पड़ने पर उन्हें खारिज करने के लिए उत्प्रेरित भी करता है। इसी उचित सम्बन्ध की तलाश में वे दिल्ली से प्रश्न कर बैठते:

अटका कहाँ स्वराज? बोल दिल्ली! तू क्या कहती है?

तू रानी बन गयी, वेदना जनता क्यों सहती है?

और प्रश्न केवल दिल्ली से ही नहीं है, प्रश्न भारतीय समाज और राजनीति की रहनुमाई करने वाले दिल्ली वालों से भी है:

फूलों की रंगीन लहर पर ओ उतराने वाले!

ओ रेशमी नगर के वासी! ओ छवि के मतवाले!

सकल देश में हालाहल है दिल्ली में हाला है,

दिल्ली में रौशनी, शेष भारत में अँधियाला है।

मखमल के पर्दों के बाहर, फूलों के उस पार,

ज्यों का त्यों है खड़ा, आज भी मरघट-सा संसार।

उत्तर मिलता न देख दिनकर की आत्मा तड़प उठती है और वे व्यथित मन से कह उठते हैं:

कुमकुम, लेपूँ किसे? सुनाऊँ किसको कोमल गान?

तड़प रहा आँखों के आगे भूखा हिन्दुस्तान।

वे यहीं पर रुकते नहीं हैं उन्हें भारतीय समाज की चुप्पी सालती है और वे उसे चेताते हुए कहते हैं:

समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध,
जो तटस्थ है, समय लिखेगा उसका भी अपराध।

इस पृष्ठभूमि में दिनकर शान्ति को नकारते हुए अशान्ति, कलह, संघर्ष और कोलाहल के पक्ष में खड़े होते हैं:

न्यायोचित सुख सुलभ नहीं, जब तक मानव-मानव को,

चैन कहाँ धरती पर तब तक, शान्ति कहाँ इस भव को?

उन्होंने राष्ट्र के रहनुमाओं को उनके फ़र्ज़ और दायित्व की याद दिलाते हुए लिखा है:

समर शेष है, अभी मनुज-भक्षी हुँकार रहे हैं।
गाँधी का पी रुधिर, जवाहर पर फुंकार रहे हैं।
समर शेष है, अहंकार इनका हरना बाकी है,
वृक को दंतहीन, अहि को निर्विष करना बाकी है।

अन्तर्राष्ट्रवाद की संभावनाओं को समाहित करता राष्ट्रवाद:

ऐसा नहीं कि दिनकर की मानवतावादी चेतना किसी भौगोलिक दायरे में सीमित हैं। इसने उनकी राष्ट्रवादी चेतना को समावेशी बनाते हुए अंतर्राष्ट्रवाद तक विस्तार दिया है जिसकी वर्तमान में भी प्रासंगिकता है। आज हमारे रहनुमा हिटलर और मुसोलनी से प्रेरित होकर भारतीय राष्ट्रवाद के नए स्वरुप को गढ़ने में लगे हुए हैं पश्चिमी राष्ट्रवाद के तर्ज़ पर। ऐसी कोशिशें दिनकर के समय भी हो रही थीं। उस समय भी ऐसे लोगों के निशाने पर गाँधी और नेहरु ही थे, और आज भी इनके निशाने पर गाँधी और नेहरु ही हैं। उस दौर में उन्होंने गाँधी की हत्या करते हुए उसे ‘वध’ की संज्ञा देकर अपने कुकर्मों पर पर्दा डालने की कोशिश की, और आज एक बार दिर से उनकी वैचारिक हत्या की कोशिशें जारी हैं। लेकिन, उनके नापाक मंसूबे न तो उस समय पूरे हुए और न ही आज पूरे होने जा रहे हैं। 1955 ई. में ही दिनकर ने शान्ति की समस्यानामक निबन्ध में इसकी भविष्यवाणी करते हुए कहा था: “आनेवाला विश्व सिकन्दर और हिटलर का विश्व नहीं, बुद्ध, ईसा, गाँधी और जवाहर का संसार होगा।” आज राष्ट्रवाद के नाम पर की जाने वाली राजनीति को प्रासंगिक बनाये रखने के लिए भारतीय राष्ट्रवाद के दुश्मनों की तलाश की जा रही है अगर देश के बाहर इसे पाकिस्तान और चीन के सापेक्ष परिभाषित करने की कोशिश की जा रही है, तो देश के भीतर  काल्पनिक दुश्मनों के रूप में मुसलमानों की पहचान की गयी है। दिनकर हर ऐसी कोशिश को नकारने का ही दूसरा नाम है। अपने इसी निबन्ध में एक राष्ट्र के रूप में भारत के चरित्र का हवाला देते हुए लिखा है: “प्रत्येक देश की वैश्विक नीति उसके राष्ट्रीय चरित्र की परछाईं होती है। हमारा राष्ट्रीय चरित्र योद्धा का नहीं, शान्ति सेवक का रहा है।”

प्रश्नाकुलता दिनकर की मूल पहचान:

दरअसल, राष्ट्रवाद हो या मार्क्सवाद या फिर गाँधीवाद, दिनकर के यहाँ ये सारी विचारधाराएँ प्रश्नों के दायरे में खड़ी हैं। जहाँ भी ये विचारधाराएँ उनकी मानवीय कसौटी पर खरी नहीं उतरी हैं, दिनकर ने इनमें से किसी को भी नहीं बख्शा है। यही प्रश्नाकुलता दिनकर की रचनादृष्टि के मूल में है और इसी ने दिनकर को किसी भी दायरे में बँधने नहीं दिया। इस रूप में दिनकर बाबा नागार्जुन के करीब ठहरते हैं जिन्होंने कहा था:

न मैं दक्षिण, न मैं वाम,

जनता को रोटी से काम।

इसी तर्ज़ पर दिनकर भी भूख, अभाव और गरीबी के नाम पर उसके बहाने विचारधारा की राजनीति करने वाले लोगों को आड़े हाथों लेते हुए कहते हैं:

दहक रहे भीषण क्षुधाग्नि से, जिनके प्राण अभागे

निर्दय है दर्शन परोसता है, जो उसके आगे;

रोटी दो, मत उन्हें दर्शन दो, जिनको भूख लगी है,

भूखों को दर्शन देना छल है, दगा, ठगी है!

ज्ञानपीठ पुरस्कार ग्रहण करते समय अपनी वैचारिक प्रेरणाओं की ओर इशारा करते हुए दिनकर ने कहा था, “जिस तरह मैं जवानी भर इक़बाल और रवींद्र के बीच झटके खाता रहा हूँ, उसी प्रकार मैं जीवन भर गाँधी और मार्क्स के बीच झटके खाता रहा हूँ। इसलिए उजले को लाल से गुणा करने पर जो रंग बनता है, वही रंग मेरी कविता का है। मेरा विश्वास है कि अंततोगत्वा यही रंग भारत के भविष्य का रंग होगा।” दिनकर अपनी प्रश्नाकुलता के ज़रिये इसी रंग की तलाश कर रहे थे, समाधान की चिंताओं से मुक्त रहकर। इस बात को वे बिना किसी लाग-लपेट के स्वीकार करते हैं:

दिनकर केवल प्रश्न उठता है,

समाधान की बात न कोई पास,

मूढ़ समस्याओं का केवल दास।

उनकी यही प्रश्नाकुलता उन्हें करीब के करीब ले आती है। इस प्रश्नाकुलता के कारण ही वे हर इस या उस व्यवस्था से टकराते हैं जो उनकी मानवीय अपेक्षाओं की कसौटी पर खरी नहीं उतरती है। वे उत्तर की चिन्ताओं से मुक्त हैं, मुक्त इसलिए कि:

जो कुछ खुलता सामने, समस्या है केवल,

असली निदान पर वज्र के ताले हैं,

उत्तर शायद हो छुपा, मूकता के भीतर,

हम तो प्रश्नों का रूप सजाने वाले हैं!

इसलिए उन्होंने अपनी रचनाओं में प्रश्नों को विविध रूपों में सजाया है जिसके कारण व्यवस्था उनकी रचनाओं के सामने खुद को असहज पाती है।

वाम और दक्षिण के दायरे से बाहर दिनकर:

संक्षेप में कहें, तो किसी दायरे में न बँधने का नाम ही दिनकर है, चाहे वो दायरा वाम का हो या दक्षिण का, गाँधी का हो या मार्क्स का, राष्ट्र का हो या अन्तर्राष्ट्र का, वर्ण का हो या जाति का, धर्म का हो या सम्प्रदाय का। दिनकर अगर कहीं बँधे दिखते हैं, तो सिर्फ और सिर्फ मानवतावाद के दायरे में; और वो भी इसलिए कि इसने उन्हें हर दायरे से मुक्त कर दिया। दिनकर की प्रश्नाकुलता भी इसी दायरे में आकार ग्रहण करती है और इसी में दिनकर का दिनकरत्व अन्तर्निहित है। उनके इस दिनकरत्व को राम वृक्ष बेनीपुरी ने पहचाना और इसकी ओर इशारा करते हुए कहा: “हमारे क्रान्ति-युग का सम्पूर्ण प्रतिनिधित्व कविता में इस समय दिनकर कर रहा है। क्रान्तिवादी को जिन-जिन हृदय-मंथनों से गुजरना होता है, दिनकर की कविता उनकी सच्ची तस्वीर रखती है।”