भक्ति-आंदोलन का आविर्भाव: इस्लाम की भूमिका
(आचार्य शुक्ल : आचार्य द्विवेदी)
भक्ति-आन्दोलन के
आविर्भाव ने आरम्भ से ही हिन्दी साहित्य के आलोचकों उद्वेलित किया है। अगर ‘द
मॉडर्न वर्नाकुलर लिटरेचर ऑफ़ हिन्दुस्तान’ के लेखक जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने
भक्ति-आन्दोलन के आकस्मिक प्रादुर्भाव की बात करते हुए इसे ईसाईयत की देन बतलाया,
तो ताराचन्द ने इसे अरबों की देन। अर्नेस्ट बिनफील्ड हैवेल ने भक्ति-आन्दोलन को भारत
में मुस्लिम-सत्ता की स्थापना और इसके कारण हिन्दुओं के राज-काज से अलग होने से सम्बद्ध
करके देखा, तो आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने इस्लामिक सत्ता के अविर्भाव की पृष्ठभूमि
में राजनीतिक परिस्थितियों में आने वाले परिवर्तन को भक्ति-आन्दोलन के उत्प्रेरक
के रूप में देखा। लेकिन, आचार्य हजारी
प्रसाद द्विवेदी ने इसे इस्लाम की प्रतिक्रिया मानने से इनकार करते हुए ‘भारतीय
चिन्ताधारा का स्वाभाविक विकास माना। इस पृष्ठभूमि
में यह प्रश्न सहज ही उठता है कि क्या भक्ति-आन्दोलन के आविर्भाव में वाकई इस्लाम
की भूमिका रही, और अगर हाँ तो कहाँ तक?
आचार्य द्विवेदी बनाम् आचार्य शुक्ल:
भक्ति-आंदोलन के
आविर्भाव के सन्दर्भ में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की दोनों पुस्तकों 'हिंन्दी
साहित्य की भूमिका' (प्रकाशन-वर्ष: सन् 1940) और 'हिंदी साहित्य: उद्भव और विकास’ (प्रकाशन-वर्ष: सन् 1952)' से गुजरते हुए ऐसा महसूस होता है कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल न तो परम्परा
से परिचित थे, न सिद्ध-नाथों की चुनौती से और न ही लोक और शास्त्र के
द्वंद्व से। और तो और, जिस तरीके से आचार्य द्विवेदी ने भक्ति आंदोलन के आविर्भाव
के संदर्भ में आचार्य रामचंद्र शुक्ल की व्याख्या को खारिज करते हुए उसके
उपहासास्पद होने का संकेत दिया है, उससे इस बात का संकेत मिलता है कि शायद आचार्य
शुक्ल को भक्ति-आन्दोलन की समझ ही नहीं थी। इस क्रम में आचार्य द्विवेदी कई बार
अति-उत्साह में आलोचकीय मर्यादा का अतिक्रमण करते हुए दिखाई पड़ते हैं, जबकि वास्तविकता
यह है कि आचार्य शुक्ल और आचार्य द्विवेदी के मत में मात्रात्मक भिन्नता तो है, पर
तात्विक भिन्नता नहीं।
समानता के बिन्दु:
यदि गहराई से
आचार्य शुक्ल और आचार्य द्विवेदी के मतों का विश्लेषण किया जाए, तो उनके बीच कई
समानताओं को रेखांकित किया जा सकता है जो उन्हें एक दूसरे के करीब लाकर खड़ा कर
देती है। उनके बीच के सादृश्य को निम्न संदर्भों में देखा जा सकता है:
1. आकस्मिक प्रादुर्भाव का खंडन:
भक्ति-आन्दोलन की व्याख्या के क्रम में आचार्य द्विवेदी ने ग्रियर्सन महोदय के 'आकस्मिक
प्रादुर्भाव' वाले मत को खारिज करते हुए कहा, “इसके लिए पहले से मेघखण्ड उपस्थित हो रहे थे।” उनका
इशारा भक्ति की भावधारा के क्रमिक विकास की ओर है और उनका यह मत सर्वविदित है।
लेकिन, इस संदर्भ में आचार्य शुक्ल का मत आचार्य
द्विवेदी से अलग नहीं है। हाँ, यह जरूर है कि वे
न तो सीधे -सीधे ग्रियर्सन से टकराते हैं और न ही स्पष्ट शब्दों में ग्रियर्सन के
मतों को खारिज करते हुए दिखाई देते हैं। इसकी पुष्टि इस बात से होती है कि आचार्य
शुक्ल ने भक्ति-आंदोलन को आदिकालीन ऐतिहासिक विकास की प्रक्रिया में रखकर देखा है।
इतना ही नहीं, वे भक्ति की परम्परा की पूर्व से विद्यमानता की ओर इशारा करते हैं
और उसे दक्षिण भारतीय वैष्णव-भक्त आलवारों की परम्परा से सम्बद्ध करके देखते हैं।
उनका यह भी मानना है कि इस्लाम की आगमन के पूर्व से ही भक्ति की यह भाव धारा
दक्षिण भारत से उत्तर भारत की ओर धीरे -धीरे एवं क्रमिक रूप से प्रवाहित हो रही
थी। स्पष्ट है कि दोनों ग्रियर्सन के ‘आकस्मिक प्रादुर्भाव’ और ‘ईसाईयत की देन’
वाले मत से असहमत हैं, लेकिन असहमति प्रदर्शित करने का दोनों का तरीका अलग- अलग
है।
2. परम्परा का स्वाभाविक विकास:- आचार्य शुक्ल
और आचार्य द्विवेदी दोनों भक्ति की भाव-धारा को भारतीय परम्परा से संबद्ध करके देखते
हैं और इसकी व्याख्या पूर्ववर्ती परम्परा की स्वाभाविक विकास के रूप में करते हैं।
3. इस्लाम की भूमिका: भक्ति-आन्दोलन के आविर्भाव के
व्याख्या के क्रम में यदि आचार्य शुक्ल ने प्रत्यक्षतः की भूमिका को स्वीकारा है, तो
आचार्य द्विवेदी ने परोक्षतः। आचार्य शुक्ल ने युगीन राजनीतिक परिस्थितियों के
बहाने इस दिशा में संकेत किया है, लेकिन उनके इस संकेत को जब
आदिकालीन ऐतिहासिक विकास की प्रक्रिया से सम्बद्ध कर देखे जाने पर इस्लाम की भूमिका
के प्रति उनकी आग्रहशीलता सतह पर आ जाती है। लेकिन, आचार्य
द्विवेदी ने भक्ति-आन्दोलन को इस्लाम की प्रतिक्रिया मानने से इनकार किया है। उन्होंने
इस्लाम की भूमिका को खारिज करते हुए भी उसके लिए 'चार आना'
वाला स्पेस छोड़ा है और अपनी बातों को आगे बढ़ाते हुए कहा, "इन सबका अर्थ
यह नहीं कि मुसलमानी धर्म का प्रभाव साहित्य पर नहीं पड़ा। पर, प्रभाव को प्रभाव के रूप में ही स्वीकार किया जाना चाहिए प्रतिक्रिया के
रूप में नहीं।"
4. टीका-ग्रंथों, निबन्धों
और भाष्यों की चर्चा: भक्ति-आन्दोलन के चर्चा के क्रम में
आचार्य शुक्ल का भी ध्यान उन टीकाओं, निबन्धों और भाष्यों
की ओर गया जिनकी मध्ययुग में रचना हुई और आचार्य द्विवेदी का भी। आचार्य शुक्ल ने
मध्ययुग में लिखे गए जिन भाष्यों की चर्चा की है, जिन अर्थ
शून्य बाहरी कर्म-विधानों का उल्लेख किया है, वे इन्हीं
टीकाओं और निबन्ध-ग्रंथों की उपज हैं। आचार्य द्विवेदी भी टीका-ग्रंथों एवं
निबन्धों की रचना की पृष्ठभूमि को स्पष्ट करते हुए वे लिखते हैं, “इस्लाम के खतरे से अपने धर्म और जाति को बचाने के लिए
भारतीय मनीषा जो उस समय कर रही थी, उसी का परिणाम टीका और निबन्ध हैं।”
सादृश्य के
उपरोक्त बिंदुओ के आलोक में यह अस्पष्ट नहीं रह जाता है कि आचार्य शुक्ल और आचार्य
द्विवेदी की भक्ति-आन्दोलन की व्याख्या में तात्विक भिन्नता की सम्भावनाओं की तलाश
उचित भी नहीं और सम्भव भी नहीं, मात्रात्मक भिन्नता चाहे जितनी हो।
भिन्नता के बिन्दु:
ऐसी स्थिति में
यह प्रश्न सहज ही उठता है कि फिर भक्ति-आन्दोलन की व्याख्या को लेकर दोनों आचार्य
किस प्रकार एक दूसरे से अलग हैं? इस सन्दर्भ में तात्विक भिन्नता की बात को पहले
ही नकारा जा चूका है। जहाँ तक मात्रात्मक भिन्नता का प्रश्न है, तो इसे निम्न
परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है:
1. युगीन परिस्थितियाँ बनाम् परम्परा: जहाँ आचार्य
शुक्ल ने भक्ति आन्दोलन की व्याख्या के क्रम में युगीन परिस्थितियों के बहाने
इस्लाम की भूमिका पर जोर दिया है, वहीं आचार्य द्विवेदी ने परम्परा की भूमिका पर।
2. परम्परा की अलग-अलग व्याख्या: यद्यपि परम्परा
दोनों के यहाँ मौजूद है, तथापि परम्परा की व्याख्या दोनों अलग-अलग तरीके से करते
हैं। आचार्य शुक्ल भक्ति की उस परम्परा को दक्षिण भारतीय आलवारों से सम्बद्ध कर के
देखते हैं, तो आचार्य द्विवेदी उस परम्परा की व्याख्या लोक बनाम् शास्त्र के उस
द्वंद्व की परिप्रेक्ष्य में करते हैं जो उत्तर भारत में लम्बे समय से चला आ रहा
था।
3. वैष्णव धर्म की स्वाभाविक अभिव्यक्ति बनाम् लोक और शास्त्र के
द्वंद्व का परिणाम: आचार्य शुक्ल की नजरों में भक्ति-आन्दोलन वैष्णव
धर्म की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है, तो आचार्य द्विवेदी के नजरों में लोक और शास्त्र
के द्वंद्व के पृष्ठभूमि में शास्त्र का लोक की ओर झुकने का परिणाम। उनकी नजरों
में भक्ति-आन्दोलन लोकधर्म की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है।
4. ‘पौरुष से हताश जाति की रचना’ वाला सन्दर्भ: आचार्य
शुक्ल ने भक्ति आंदोलन को आदिकालीन ऐतिहासिक विकास की प्रक्रिया में रखकर देखते
हुए जो बातें की, उससे ऐसा प्रतीत होता है, मानो वे भक्ति-काल को पौरुष
से हताश जाति की रचना मान रहे हों; यद्यपि उन्होंने ऐसा स्पष्ट शब्दों में नहीं
कहा है। इसके विपरीत, आचार्य द्विवेदी आचार्य शुक्ल की इस धारणा को खारिज करते हुए
दृढ़तापूर्वक इस बात की घोषणा करते हैं कि भक्ति-काव्य पौरुष से हताश जाति की रचना
नहीं है।
5. मध्य युगीन टीका-ग्रन्थ अलग-अलग चुनौतियों के परिणाम: आचार्य
शुक्ल मध्ययुगीन टीकाओं और भाष्यों को सिद्ध-नाथ संतों की चुनौती के परिपेक्ष्य
में रखकर देखते हैं तो आचार्य द्विवेदी इस्लाम के द्वारा प्रस्तुत चुनौती के
परिपेक्ष्य में।
उपरोक्त तथ्यों
के आलोक में यह निष्कर्ष सहज ही प्रस्तुत किया जा सकता है कि आचार्य शुक्ल न केवल
युगीन परिस्थितियों और उसकी भूमिका से वाकिफ हैं, वरन भक्ति की परम्परा की
विद्यमानता और इसकी पृष्ठभूमि में भक्ति-आन्दोलन के स्वाभविक विकास की प्रक्रिया से
भी उनका परिचय था। आचार्य शुक्ल लोक और शास्त्र के द्वंद्व से भी वाकिफ थे। उन्हें
न केवल सिद्ध-नाथ संतो की चुनौती, वरन् उनकी सीमाओं का भी भान था। इस बात की पुष्टि
सिद्ध-नाथ संतों के सन्दर्भ में की गई इस टिप्पणी से भी होती है, "सिद्ध एवं नाथ संतो का उद्देश्य कर्म की रूढ़ियों को
कर्मकांड की तंग गलियों से निकाल कर प्रकृत धर्म के खुले क्षेत्र में लाना नहीं
था। जनता की दृष्टि में आत्म कल्याण और लोक कल्याण विधायक सच्चे कर्मों की और ले
जाने के बदले वे उसे कर्म क्षेत्र से ही हटाने में लग गए थे।" आगे
वे इसी पृष्ठभूमि में कबीर की ऐतिहासिक भूमिका की ओर इशारा करते हुए कहते हैं, "निस्संदेह, कबीर ने ऐन मौके पर जनता के उस बड़े भाग को
सँभाला जो नाथपन्थियों के प्रभाव से प्रेम-भाव और भक्ति-रस से शून्य और शुष्क पड़ता
जा रहा था।" मतलब यह कि आचार्य शुक्ल ने लोक के अंतर्विरोधों को
भी नोटिस में लिया है और इस ओर इशारा किया है कि भक्ति-आन्दोलन शास्त्र की रूढ़ियों
के ही विरुद्ध नहीं है, वरन् यह लोक के रूढ़ियों के भी विरुद्ध है। लेकिन, आचार्य द्विवेदी लोक और शास्त्र के इस द्वंद्व को नोटिस में ले पाने में
असमर्थ रहे हैं, अन्यथा आचार्य द्विवेदी के बहाने ‘दूसरी
परम्परा की खोज’ करने वाले नामवर सिंह को यह नही लिखना पड़ता, "सामान्य जनता
में प्रचलित टोना-टोटकों, तंत्र-मंत्र, मिथक आदि विश्वासों को ही द्विवेदी जी लोक धर्म मानते हैं।" इतना ही नहीं, आचार्य शुक्ल भक्ति-आन्दोलन को भारत की सामासिक संस्कृति
के वाहक के रूप में देखते हैं और इसके समावेशी एवं संश्लेषी स्वरूप की ओर इशारा
करते हुए लिखते हैं, "अतः मुसलमानों का
साम्राज्य स्थापित होने के बाद हिंदुओं और मुसलमानों के समागम से दोनों के लिए जो
सामान्य भक्ति मार्ग आविर्भूत हुआ वह अद्वैतवाद रहस्य को लेकर जिसमें वेदांत और
सूफी मत दोनों का मेल था।"
मत-भिन्नता के कारण:
अब प्रश्न यह
उठता है कि भक्ति-आन्दोलन की व्याख्या के क्रम में आचार्य शुक्ल और द्विवेदी दोनों
के मतों में जो भिन्नता उभर कर सामने आती है, उसकी व्याख्या किस परिप्रेक्ष्य में
की जा सकती है और उसके कारण क्या हैं? इसे निम्न परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता
है:
1. लोक के भिन्न मायने: दरअसल, आचार्य शुक्ल और आचार्य
द्विवेदी की साहित्य-दृष्टि में भिन्नता है। आचार्य शुक्ल की साहित्य-दृष्टि के
केंद्र में लोक है और यह लोक जनता का पर्याय है जिसमें भारतीय समाज के सभी समूह के
लोग शामिल हैं। इतना ही नहीं, उस जनता को लेकर आचार्य शुक्ल दुविधा में रहे हैं। उसमें
‘जनता’ एवं ‘शिक्षित जनता’ का द्वंद्व है जो उनकी पुस्तक ‘हिन्दी साहित्य का
इतिहास’ की भूमिका में परिलक्षित होता है। इसके पहले संस्करण में वे साहित्य को ‘शिक्षित
जनता के ह्रदय का संचित प्रतिबिम्ब’ मानते हैं, तो दूसरे संस्करण में ‘जनता के
ह्रदय का संचित प्रतिबिम्ब’। यह इस बात की और संकेत करता है कि आचार्य शुक्ल के मन
में गहरे स्तर पर कहीं-न-कहीं शिक्षित जनता के प्रति प्रबल आकर्षण है। यह आकर्षण
उनकी व्यावहारिक आलोचना में कवियों एवं रचनाओं के चयन और उनके व्यावहारिक विश्लेषण
एवं मूल्यांकन के क्रम में भी परिलक्षित होता है। तुलसी यूँ ही आचार्य शुक्ल के प्रिय
कवि और ‘राम चरित मानस’ प्रिय रचना नहीं है।
इससे
भिन्न, आचार्य द्विवेदी की साहित्य-दृष्टि के केंद्र में है लोक, और उनके यहाँ लोक
समाज के हाशिए पर के समूह का प्रतिनिधित्व करता है। यह लोक समाज के उस समूह का प्रतिनिधित्व करता है जो शास्त्र, शास्त्र प्रतिपादित धर्म और शास्त्र प्रतिपादित चिंतन, जिसे सामंती-पुरोहितवादी
गठबंधन का संरक्षण मिला है, के हाथों सदियों से शोषण एवं उत्पीड़न का शिकार रहा है।
2. शास्त्र और लोक की चिन्ताएँ अलग-अलग: जब आचार्य शुक्ल
भक्ति-आन्दोलन के आविर्भाव के प्रश्न पर विचार कर रहे होते, तो उनके सामने भक्ति
की परम्परा भी मौजूद होती है, लोक एवं शास्त्र का द्वंद्व भी
मौजूद होता है और इस्लाम की भूमिका भी मौजूद होती है। इनमें इस्लाम की भूमिका नवीन
तत्व के रूप में सामने होती है, जबकि लोक और शास्त्र का द्वंद्व पारम्परिक तत्व के
रूप में मौजूद होता। चूँकि आचार्य शुक्ल की साहित्यिक दृष्टि के केंद्र में जो ‘जनता’
है जिसमें समाज के सभी समूह के लोग शामिल हैं, उसकी नज़रों
में लोक-शास्त्र के द्वंद्व की तुलना में इस्लाम का आगमन, जिससे समाज की रहनुमाई
करने वाले समूह सीधे-सीधे और कहीं अधिक प्रभावित हो रहे थे, कहीं अधिक मायने रखता
है। स्पष्ट है कि जब समाज के रहनुमाई करने वाले वर्ग के आलोक में लोक और शास्त्र
के द्वंद्व एवं इस्लाम की भूमिका को देखा जाए, तो निश्चय ही इस्लाम के आगमन ने
उनकी नियति के निर्धारण में कहीं अधिक अहम् भूमिका निभाई, लोक
और शास्त्र की द्वंद्व की तुलना में। यही कारण है कि नवीन तत्व के रूप में इस्लाम
का आगमन उन्हें अधिक आकर्षित करता है।
जहाँ
तक आचार्य द्विवेदी का प्रश्न है, तो आचार्य शुक्ल की तरह उनके सामने ‘परम्परा’ की
भी मौजूदगी थी और इस्लाम की भी मौजूदगी थी। लेकिन, उन्होंने भारतीय समाज
के जिस हाशिए पर के समूह को अपने
साहित्यिक चिंतन के केन्द्र में रखा, उसके लिए लोक और शास्त्र का द्वंद्व जीवन-मरण
का प्रश्न था। यह प्रश्न उसके अस्तित्व से सम्बद्ध हो गया था। ऐसा नहीं है कि
इस्लाम के आगमन ने इस समूह को प्रभावित नहीं किया, लेकिन इस
समूह तक यह प्रभाव अपेक्षाकृत देर से पहुँचा। साथ ही, यह समूह अस्तित्व के जिस प्रश्न
से जूझ रहा था, उस प्रश्न के सामने इस्लाम का प्रश्न गौण था।
3. आलोचकीय व्यक्तित्व के निर्माण के भिन्न परिवेश: गाँधीवाद बनाम्
वामपन्थ का उभार: यहाँ पर यह प्रश्न सहज ही उठता है कि आचार्य
शुक्ल ने अपने साहित्य-चिन्तन के केन्द्र में ‘जनता’ को ही क्यों रखा और अआचार्य
द्विवेदी ने ‘लोक’ अर्थात् शोषित-उत्पीड़ित जनता को ही क्यों? दरअसल, आचार्य शुक्ल के आलोचकीय व्यक्तित्व का विकास जिस
1920 के दशक में हुआ, वह दौर गाँधी और गाँधीवाद की बढ़ती हुयी लोकप्रियता का दौर है।
उन्होंने उपनिवेशवाद-विरोधी संयुक्त मोर्चे के निर्माण पर जोर दिया और इसकी मजबूती
के लिए वर्ग-समन्वय की बात की। इसी के मद्देनजर उन्होंने ट्रस्टीशिप और अछूतोद्धार
जैसी संकल्पनाओं को प्रस्तुत किया और राष्ट्रीय आन्दोलन के एजेंडे को समावेशी स्वरुप
प्रदान करते हुए उसे जनांदोलन में तब्दील करने का प्रयास किया। फलतः इस दौर में
भारतीय समाज के एकल विरोधाभास: औपनिवेशिक हितों एवं भारतीय जनता के मध्य हितों के अंतर्विरोध
पर जोर देते हुए भारतीय समाज के आंतरिक विरोधाभास: शोषक और शोषित वर्ग के मध्य हितों
के अंतर्विरोध को छुपाया गया। निश्चय ही, इस परिवेश, इसके समक्ष मौजूद चुनौतियों,
और उन चुनौतियों के आलोक में तद्युगीन राष्ट्रवादी जरूरतों के साथ-साथ गाँधी एवं गाँधीवाद
की लोकप्रियता ने भी आचार्य शुक्ल के आलोचकीय व्यक्तित्व को प्रभावित किया।
इतना
ही नहीं, आचार्य शुक्ल की वैष्णव धर्म एवं वैष्णव
संस्कारों में गहरी आस्था थी। और इसी आस्था के कारण वे तुलसी के
समन्वयवादी चेतना और ‘राम चरित मानस’ में आकार ग्रहण करने वाली उनकी
सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टि से वे गहरे स्तर पर प्रभावित थे। उन्होंने सहिष्णुता और
समन्वय को भारतीय संस्कृति के मूल्य के रूप में आत्मसात किया। इसीलिए साहित्य को
लेकर उनकी सोच भारतीय समाज के हर समूह को ध्यान में रखती है।
इसके
विपरीत, आचार्य द्विवेदी के आलोचकीय व्यक्तित्व का
विकास जिस 1930-40 के दशक में हुआ, वह दौर वामपंथ की लोकप्रियता का दौर
था। वामपंथ ने न केवल राष्ट्रीय आन्दोलन के एजेंडे को बदला, वरन् राष्ट्रीय मुक्ति
के प्रश्न को व्यापक सामाजिक-आर्थिक सन्दर्भों से संदर्भित करते हुए सत्ता-परिवर्तन
के प्रश्न को व्यवस्था-परिवर्तन के प्रश्न में तब्दील कर दिया। इसके लिए उसने
भारतीय समाज के दोहरे विरोधाभास की बात करनी शुरू की: एक, जो औपनिवेशिक हितों और
भारतीय जनता के हितों के बीच मौजूद था; और दूसरा, जो भारतीय समाज का आंतरिक
विरोधाभास: शोषक और शोषित वर्ग के हितों के बीच था, सामन्तों-जमींदारों
और किसानों के हितों के बीच था तथा पूँजीपतियों-उद्योगपतियों और मजदूरों के हितों
के बीच था। यही कारण है कि वामपंथ वर्ग-समन्वय की बजाय वर्ग-संघर्ष पर जोर देता है,
और द्वंद्व एवं तनाव को छुपाने के बजाय उसे उभारने की हिमायत करता
है। आचार्य द्विवेदी वामपंथी तो नहीं थे, लेकिन उनके आलोचकीय व्यक्तित्व पर परोक्षतः
ही सही पर वामपंथ की गहरी छाप रही है। यही कारण
है कि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी सिद्ध-नाथ संतो से लेकर कबीर की ओर मुखातिब होते
हैं, और कबीर की सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टि उन्हें गहरे स्तरों पर प्रभावित करती
हैं।
स्पष्ट है कि
आचार्य शुक्ल हों या आचार्य द्विवेदी, दोनों के आलोचकीय व्यक्तित्व तदयुगीन
राष्ट्रीय जरूरतों और तदयुगीन राष्ट्रीय परिवेश के अनुरूप आकार ग्रहण करते हैं। यहाँ
पर इस बात को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि आचार्य द्विवेदी के समय तक आते-आते मार्क्स
के 'एशियाटिक मोड ऑफ प्रोडक्शन' की अवधारणा को भी खारिज किया जाने लगा था जो एशियाई समाज में
परिवर्तन के आंतरिक तत्वों की बात करता हुआ उसे अगतिशील समाज घोषित करता है। आचार्य
द्विवेदी की भक्ति-आन्दोलन की व्याख्या से गुजरते हुए ऐसा महसूस होता है कि वे 'एशियाटिक
मॉड ऑफ प्रोडक्शन' का प्रतिवाद करते हुए यह बतलाने की कोशिश
कर रहे हों कि भारतीय समाज में परिवर्तन के तत्व: लोक एवं शास्त्र के द्वंद्व के
रूप में आंतरिक स्तर पर आरम्भ से ही मौजूद रहे हैं। उनकी नज़रों में, लोक और
शास्त्र के बीच का द्वंद्व हजारों वर्षों से चल आ रहा है और इस द्वंद्व ने भारतीय
समाज को गतिशील बनाये रखा है।
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