भक्ति-आन्दोलन:
भारतीय चिन्ताधारा का स्वाभाविक विकास
आकस्मिक प्रादुर्भाव का खंडन:
भक्ति-आन्दोलन
के सन्दर्भ में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के मतों का निर्धारण ग्रियर्सन और
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के मतों की प्रतिक्रिया में हुआ है। आचार्य द्विवेदी ने अपनी पुस्तक ‘हिंदी
साहित्य की भूमिका’ में ग्रियर्सन के मत का खंडन करते हुए कहा कि “भक्ति अचानक बिजली के समान नहीं उमड़ी, वरन उसके लिए वर्षो
से मेघखंड उपस्थित हो रहे थे।” इस क्रम में उन्होंने भक्ति-आंदोलन के आविर्भाव के संदर्भ में इस्लाम
की भूमिका से सम्बंधित आचार्य शुक्ल के मत को खारिज करते हुए इसे ‘इस्लाम की
प्रतिक्रिया’ मानने से इनकार किया। आचार्य द्विवेदी की नजरों में, भक्ति-आन्दोलन भारतीय चिन्ताधारा का
स्वाभाविक विकास है। वे लोक और शास्त्र के द्वंद्व के परिप्रेक्ष्य में इसकी व्याख्या करते
हुए कहते हैं, “भारतीय पांडित्य ईसा की एक शताब्दी
के बाद आचार-विचार एवं भाषा के क्षेत्रों में स्वभावत: ही लोक की ओर झुक गया था।”
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में लोक-शास्त्र द्वंद्व:
आचार्य द्विवेदी
के उपरोक्त मत के आलोक में यदि लोक और शास्त्र के द्वंद्व पर विचार किया जाए, तो
इस द्वंद्व की जड़ें छठी शताब्दी ईसा पूर्व तक जाती दिखती हैं। इस समय तक आते-आते पशुपालक
अर्थव्यवस्था का कृषक अर्थव्यवस्था में रूपांतरण हुआ, और फिर इसने कृषि-अधिशेष की
संभावनाओं को बल प्रदान किया। इसने व्यापार एवं वाणिज्य की संभावनाओं को बल प्रदान किया, और अन्ततः
इसकी परिणति ‘दूसरे शहरीकरण’ के रूप में हुई। यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें वैदिक
धर्म एवं चिंतन से संबंधित मान्यताएँ अप्रसांगिक होने लगीं और बदली हुई
सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों में उन्हें पुनर्परिभाषित किए जाने की आवश्यकता महसूस
हुई। इस काम को किया
औपनिषदिक चिंतन ने, वैदिक धर्म और चिंतन के दायरे में रहते हुए और बौद्ध धर्म ने,
वैदिक धर्म एवं चिंतन को लाँघ कर।
छठी सदी ईसा पूर्व: लोक-शास्त्र द्वंद्व
छठी सदी ईसा
पूर्व में औपनिषदिक चिंतन और बौद्ध धर्म ने यज्ञ के दौरान होने वाले कर्मकांड और
पशु-बलि का विरोध किया, ताकि कृषक अर्थव्यवस्था की ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए पशुधन
के संरक्षण को सुनिश्चित किया जा सके। इतना ही नहीं, बौद्ध चिंतन ने तो संघ के भीतर वर्णगत-जातिगत विभेदों
को नकारते हुए लोक की आकांक्षाओं एवं अपेक्षाओं की कसौटी पर खरा उतरने का हरसंभव
प्रयास करते हुए न केवल आर्थिक एवं सामाजिक प्रगति के बीच सामंजस्य भी बिठाने की
कोशिश की और शहरीकरण की ज़रूरतों के अनुरूप खुद को ढ़ालने का प्रयास भी किया। यही कारण है कि तदयुगीन जनमानस ने
बौद्ध धर्म को हाथों हाथ लिया और उसे राजसत्ता का संरक्षण भी मिला। स्पष्ट है लोक और शास्त्र के चिंतन
में वैदिक चिंतन औपनिषदिक चिंतन यदि शास्त्र का प्रतिनिधित्व करता है, तो बौद्ध
चिंतन लोक का। अगर औपनिषदिक चिंतन वैदिक धर्म एवं चिंतन के प्रति सुधारवादी
प्रतिक्रिया है, तो बौद्ध चिंतन क्रांतिकारी प्रतिक्रिया।
बौद्ध धर्म के भीतर गहराता लोक-शास्त्र द्वंद्व
मौर्योत्तर काल में
ईस्वी सन् तक आते-आते बौद्ध-ब्राह्मण द्वंद्व की पृष्ठभूमि में लोक और शास्त्र के
इस द्वंद्व को जोर पकड़ते देखा जा सकता है और ब्राह्मणवाद की पुनर्वापसी की पृष्ठभूमि
में बौद्ध धर्म की स्थिति कमजोर पड़ने लगती है। कारण यह कि इस दौर तक
आते-आते बौद्ध धर्म का स्वरूप विकृत हुआ।
साथ ही, इस दौर में बौद्ध धर्म को राजसत्ता
के संरक्षण से वंचित होना पड़ा। इस पृष्ठभूमि में शंकराचार्य, कुमारिल भट्ट और उदयन ने ब्राह्मण धर्म
की ओर से दार्शनिक दबाव निर्मित करते हुए बौद्ध धर्म को निर्वासन की स्थिति में पहुँचा
दिया। मजबूरन बौद्ध धर्म को अपना अस्तित्व बचने के लिए लोक की और उन्मुख होना पड़ा और लोक से जुड़कर अपने
लिए नवीन संभावनाओं की तलाश करनी पड़ी। यही वह बिंदु है जहाँ लोक और शास्त्र के द्वंद्व ने बौद्ध धर्म के
दरवाजे पर दस्तक दिया और लोक को लुभाते हुए उसके करीब पहुँचने की कोशिश में बौद्ध
धर्म भक्ति की ओर उन्मुख हुआ। और, अन्ततः इसका परिणाम बौद्ध धर्म के हीनयान
एवं महायान के विभाजन के रूप में हुआ। इसमें हीनयान ने शास्त्रीय बौद्ध
धर्म का प्रतिनिधित्व किया, तो महायान ने बौद्ध धर्म के उस रूप का, जो लोक के बीच
आकार ग्रहण कर रहा था।
सिद्धों-नाथों का आविर्भाव:
यह प्रक्रिया
यहीं पर नहीं रुकी। समाज के हाशिए पर के समूह से जुड़ने और उन्हें अपनी ओर आकृष्ट करने के
क्रम में बौद्ध धर्म में अनार्य तत्वों के रूप में तंत्र-मंत्र एवं जादू-टोने का
प्रवेश हुआ। इसके परिणामस्वरूप लोकर्षण के रास्ते पर बढ़ती बौद्ध धर्म की महायान शाखा ने तंत्र-मंत्र की शरण ली, और इन
दोनों की क्रिया-प्रतिक्रिया ने वज्रयान संप्रदाय
के आविर्भाव का आधार तैयार किया। सिद्धों का संबंध इसी वज्रयान शाखा से सम्बद्ध सहजयान सम्प्रदाय से
जाकर जुड़ता है। सिद्ध संतों के द्वारा पंच-मकारों (मद्य, माँस, मत्स्य, मुद्रा और मैथुन)
का सेवन लोक की ओर इनकी उन्मुखता और लोक से उनकी सम्बद्धता का संकेत देता है। इसी सम्बद्धता के कारण उन्होंने लोक
की आकाँक्षाओं के अनुरूप हिंदू धर्म और हिंदू सामाजिक व्यवस्था की रुढियों,
कर्मकांडों एवं कुरीतियों का विरोध करते हुए वर्णगत-जातिगत भेदभाव के खिलाफ हमलावर
तेवर अपनाया।
लेकिन, सहजयानी
सिद्धो को पंच-मकारों के सेवन और भोग-विलास के दलदल में फँसते देखकर उनके बीच से
एक असंतुष्ट समूह का उभार हुआ जिसने सिद्धों से अलग रास्ता अख्तियार करते हुए इन्द्रिय
संयम एवं नैतिक शुद्धि पर बल दिया। प्रवृत्तियों
के दमन के कारण योग का यह रूप अपेक्षाकृत अधिक कठिन था, इसीलिए इसे हठयोग कहा जाने लगा। अन्ततः बौद्ध धर्म, तंत्र-मंत्र और शैव मत की क्रिया-प्रतिक्रिया की
पृष्ठभूमि में नाथ-पंथ का आविर्भाव हुआ। ये सिद्ध-नाथ संत शास्त्र, शास्त्र-प्रतिपादित
धर्म और शास्त्र-प्रतिपादित चिंतन के विरुद्ध लोक की चिन्ताओं एवं आकांक्षाओं का
प्रतिनिधित्व करते थे। आचार्य द्विवेदी के
शब्दों में कहें, तो “आठवीं शताब्दी के आसपास
पूर्वी भारत, नेपाल और तिब्बत पहुँचकर बौद्ध धर्म का तंत्रवाद से दृढ़तर संबंध
स्थापित हुआ, और इसने तंत्र-मंत्र, जादू-टोना और अनुष्ठान के सहारे लोक में आमजन
के बीच अपना प्रभाव फैलाया। आगे चलकर 9वीं-10वीं शताब्दी में नेपाल की तराई में शैव और
बौद्ध-साधनाओं के सम्मिश्रण से नाथ-पंथ का आविर्भाव हुआ।”
ऐसा नहीं है कि
शास्त्र, शास्त्र-प्रतिपादित धर्म और शास्त्र-प्रतिपादित चिंतन ने केवल बौद्ध धर्म
को ही प्रभावित किया हो। सच तो यह है कि जिस दौर में बौद्ध धर्म योग की रुढियों और कर्मकांडों
में उलझता दिख रहा था, उसी दौर में शास्त्र-प्रतिपादित धर्म स्मृति-सम्मत वैष्णव
धर्म के रूप में खुद का पुनरुद्धार कर रहा था। अपने पुनरुद्धार के क्रम में वैष्णव
धर्म ने बौद्ध धर्म से अहिंसा के तत्व को ही स्वीकार नहीं किया, वरन् बुद्ध को
विष्णु के नौवें अवतार के रूप में भी स्वीकार किया। स्पष्ट है कि इस दौर में अगर सिद्ध-नाथ
संत लोक के पक्ष का प्रतिनिधित्व करते हैं, तो स्मृति-सम्मत साध्य वैष्णव धर्म
शास्त्र के पक्ष का। अगर हजारी प्रसाद द्विवेदी के
शब्दों में कहें, तो “ईसा की प्रारंभिक सदी के
आसपास बौद्ध धर्म में लोक मत की प्रधानता स्वीकार की और आगे चलकर लोकमत में हुई
मिलकर लुप्त हो गया और यह स्थिति बौद्ध धर्म की ही नहीं थी, कमोबेश सभी संप्रदाय
की थी जिन्होंने ज्ञानियों एवं पंडितों की आसन से उतरकर लोकमत की ओर आते हुए देखा
जा सकता है।”
सगुण-निर्गुण विवाद:
यही वह
पृष्ठभूमि है जिसमें सगुण-निर्गुण विवाद गहराता हुआ दिखाई पड़ा। यद्यपि इन दोनों के बीच कोई स्पष्ट विभाजक
रेखा नहीं खींची जा सकती है, तथापि यह बात अलक्षित नहीं रह जाती है कि इस पूरे
विवाद में निर्गुण लोक के कहीं अधिक करीब दिखाई पड़ता है और सगुण शास्त्र के कहीं
अधिक करीब। जहाँ निर्गुण हिन्दू-मुस्लिम सांस्कृतिक द्वंद्व को लेकर मुखर है,
वहीँ सगुन मौन। निर्गुण संत कबीर ने हिन्दुओं और मुसलमानों
के द्वंद्व को सांस्कृतिक धरातल पर अभिव्यक्ति प्रदान की है, तो जायसी ने राजनीतिक
धरातल पर। इसने भारत की गंगा-जमुनी तहजीब के निर्धारण में अहम् एवं निर्णायक भूमिका
निभायी।
इसी आलोक में भक्ति-आन्दोलन
को भारतीय चिन्ताधारा का स्वाभाविक विकास मानने वाले
आचार्य द्विवेदी इस निष्कर्ष के साथ उपस्थित होते हैं, “यदि अगली शताब्दियों में भारतीय इतिहास की अत्यंत
महत्वपूर्ण घटना अर्थात इस्लाम का प्रभुत्व विस्तार ना भी घटित होती, तो भी वह इसी
रास्ते जाता। उसके भीतर की शक्ति उसे इसी स्वाभाविक विकास की ओर
ठेले लिए जा रहे थे।” आचार्य द्विवेदी यहीं पर नहीं रुकते। अपनी बातों को आगे बढ़ाते हुए वे
लिखते हैं, “मैं जोर देकर कहना चाहता हूँ कि यदि
इस्लाम नहीं आया होता, तो भी हिंदी साहित्य का स्वरूप बारह आना वैसा ही होता जैसा
आज है।” मतलब यह कि
आचार्य द्विवेदी के यहाँ भी इस्लाम की भूमिका के लिए ‘चार आना वाला स्पेस’ मौजूद
है, तभी तो वे इस स्पष्टीकरण के साथ उपस्थित होते हैं, “इन सब का यह अर्थ नहीं कि मुसलमानी धर्म का प्रभाव साहित्य पर नहीं पड़ा,
पर प्रभाव को प्रभाव के रूप में ही देखा जाना चाहिए, प्रतिक्रिया के रूप में नहीं।” इसी प्रभाव की ओर इशारा करते हुए वे लिखते हैं, “इस्लाम के खतरे से अपने धर्म और जाति को बचाने के लिए
भारतीय मनीषा जो उस समय कर रही थी, उसी का परिणाम टीका और निबंध ग्रन्थ है।”
Thankyou sir
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