Wednesday, 17 March 2021

अब मैं ‘कविता’ नहीं लिखता!

अब मैं ‘कविता’ नहीं लिखता!

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          अब मैं ‘कविता’ नहीं लिखता!

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आज मैं ‘कविता’ नहीं लिखूँगा, और 

लिखूँ भी तो, 

क्यों लिखूँ, 

किसके लिए लिखूँ? 

अपने लिए लिखने की जरूरत नहीं, और 

तुम्हारे लिए मेरे लिखने का कोई मतलब नहीं;

और, बिना मतलब के 

मैं लिख नहीं सकता, 

लिखना नहीं चाहता। 

क्या फ़र्क़ पड़ता है 

कि वहाँ अब मन्दिर बनेगा, 

जहाँ कल तक मस्जिद हुआ करता था, 

जिसके लिए उसी तरह मस्जिद को गिराया गया, 

जिस तरह (शायद) कभी मन्दिर को गिराया गया हो, 

या कि न भी गिराया गया हो, तो 

क्या फ़र्क़ पड़ता है? 

तुम्हारे लिए तो वह इबादत की जगह नहीं, 

वर्चस्व का प्रतीक है, 

बहुसंख्यकों के वर्चस्व का प्रतीक; पर 

मेरे लिए तो वह 

अब भी क़ब्रगाह है इन्सानियत की, 

गाँधी के समावेशी भारत के सपनों की, 

आज़ाद भारत के लोकतंत्र की, 

लोकतांत्रिक संस्थाओं की। 

काश! इस क़ब्रगाह पर खड़े राम 

प्रतीक बन पाते, उस ‘राम’ के, 

जो जन-जन में व्याप्त है, 

जो कण-कण में व्याप्त है, 

जिसे गंगा-जमुनी तहजीब की 

सामूहिक सांस्कृतिक चेतना ने स्वीकारा है, 

जिसे आदिकवि वाल्मीकि से लोकनायक तुलसी तक, और 

राष्ट्रकवि गुप्त से विद्रोही निराला तक ने सँवारा है।

क्या फ़र्क़ पड़ता है 

कि अच्छे दिन आये या नहीं;

क्या फर्क पड़ता है 

कि पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ रही हैं,

या फिर इनमें कमी आ रही है?

क्या फर्क पड़ता है 

कि गरीबी और बेरोजगारी बढ़ रही है, या फिर  

इसमें कमी आ रही है;

क्या फर्क पड़ता है 

कि इंसानियत जिंदा है, या 

हमने उसका सौदा कर लिया, या फिर 

वह मर चुकी है?


क्या फ़र्क़ पड़ता है

कि सार्वजनिक शिक्षा एवं सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था रहे, 

या फिर शिक्षा-स्वास्थ्य को पूरी तरह से निजी आकाओं के हवाले कर दिया जाए?

क्या फ़र्क़ पड़ता है

कि पहले हमने खुद को बेचा 

या फिर हमारे रहनुमाओं ने;

कि पहले हमें हमारे रहनामुओं ने हमें खरीदा,

या फिर हमारे रहनुमाओं को उनके रहनुमाओं ने?


क्या फ़र्क़ पड़ता है 

कि सार्वजनिक रेल और सार्वजनिक बैंक रहें या जाएँ,

बस राजनीति की रेल,

चाहे ‘इसकी’ हो या ‘उसकी’,

पटरी या बेपटरी सरपट दौड़नी चाहिए?

इसीलिए तो ‘फ़र्क़ नहीं पड़ता’

केदार नाथ सिंह के युग का ही मुहावरा नहीं,

मेरे युग का भी मुहावरा है।


शायद यही कारण है

कि अब मैं ‘कविता’ नहीं लिखता,

क्योंकि  

कविता वे लिखते हैं जो जीवित होते हैं; 

कविता लिखने के लिए मरना पड़ता है।

लेकिन, मैं तो मर नहीं सकता,

क्योंकि 

क्योंकि 

मरने के लिए जीवित होना पड़ता है, किन्तु

और जो कुछ भी हो, पर 

मैं जीवित नहीं।

हाँ, मैं जीवित नहीं हूँ

क्योंकि जीवित रहने के लिए 

अहसास चाहिए,

अहसास के लिए संवेदनाएँ चाहिए, और 

अब न तो अहसास शेष हैं और न ही संवेदनाएँ, और

बिना इनके सोचना संभव नहीं। 

सार्त्र ने कहा था:

‘मैं सोचता हूँ, इसलिए मैं हूँ।’, और 

मैं कहता हूँ:

‘मैं नहीं हूँ, क्योंकि मैं नहीं सोचता हूँ।’  

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