Saturday, 23 September 2017

‘दिनकर होने के मायने’

                    ‘दिनकर होने के मायने’
न तो मैंने दिनकर को बहुत पढ़ा है और न ही दिनकर के बारे में बहुत कुछ जानता हूँ, पर उनके बारे में जितना भी जानता हूँ, उसके आधार पर यह कह सकता हूँ कि अगर आज दिनकर होते, तो ‘दिनकरवादियों’ के हाथों अपना हश्र देखकर पीड़ा एवं व्यथा से भर उठते आज के सवर्ण सत्तावादी विमर्श ने जिस तरह दिनकर को हथियाने की कोशिश की है, उसे देख निश्चय ही दिनकर की आत्मा कराह रही होगी। दिनकर को मैनें अबतक जितना जाना और समझा है, दिनकर और चाहे जो हो जाएँ, कम-से-कम वो तो नहीं ही हो सकते। इसकी पुष्टि ‘रश्मिरथी’ की इन पंक्तियों से होती है:
'कौन जन्म लेता किस कुल में? आकस्मिक ही है यह बात,
छोटे कुल पर, किन्तु यहाँ होते तब भी कितने आघात!
स्पष्ट है कि दिनकर एक प्रश्न थे सत्ता एवं व्यवस्था के समक्ष, ऐसे प्रश्न जिसमें उत्तर पाने से कहीं अधिक बेचैनी अपनी गाँठ खोलने की है। यही बेचैनी तो दिनकर को युग-प्रवर्तक कबीर के करीब भी ले आती है और उनके युगनायक प्रेमचंद के करीब भी। और, यही वह बिंदु है जहाँ दिनकर देश एवं काल की सीमा को लाँघ आज के दौर में भी अपनी प्रासंगिकता सिद्ध करते हुए आते हैं। आज के विमर्श में, जबकि हम वाम और दक्षिण के बीच बँटकर रह गए हैं और बीच का स्पेस समाप्त हो चुका है, ऐसे समय में दिनकर की ये पंक्तियाँ हमें चेताती हैं:
दहक रहे भीषण क्षुधाग्नि से, जिनके प्राण अभागे
निर्दय है दर्शन पड़ोसता है, जो उसके आगे;
रोटी दो, मत उन्हें दर्शन दो, जिनको भूख लगी है,
भूखों को दर्शन देना, छल है, दगा, ठगी है!
शायद बाबा नागार्जुन और निराला को छोड़ हिन्दी साहित्य में दिनकर के अलावा ऐसा दूसरा कवि नहीं मिलेगा जिसे पचा पाना किसी धारा के वश में न हो  सीलिए मैनें कहा कि दिनकर प्रश्न हैं व्यवस्था के समक्ष, जिसे बर्दाश्त कर पाना किसी भी सत्ता एवं व्यवस्था के लिए मुमकिन नहीं है। दिनकर स्वयं भी इस बात से वाकिफ थे, इसीलिए वे इसका संकेत देते हुए कहते हैं कि:
दिनकर केवल प्रश्न उठता है,
समाधान की बात न कोई पास,
मूढ़ समस्याओं का केवल दास।
अब, यह प्रश्न सहज ही उठता है कि दिनकर क्यों केवल प्रश्न उठता है, तो इसका जवाब भी उनके यहाँ मौजूद है:
जो कुछ खुलता सामने, समस्या है केवल,
असली निदान पर वज्र के ताले हैं,
उत्तर शायद हो छुपा, मूकता के भीतर,
हम तो प्रश्नों का रूप सजाने वाले हैं!
क्या यह सच नहीं कि दिनकर की इन पंक्तियों से गुजरते हुए हमें ऐसा महसूस होता है कि यह दिनकर के युग का सच हो अथवा नहीं, पर उससे बड़ा सच हमारे युग का है? दिनकर अपने युग के सच से साक्षात्कार का ही दूसरा नाम है। दिनकर ने लिखा भी है: “मैं तो समय का पुत्र हूँ और मेरा सबसे बड़ा कार्य यह है कि मैं अपने युग के क्रोध और आक्रोश को, अधीरता और बेचैनियों को सबलता के साथ छंदों में बाँध सबके सामने उपस्थित कर सकूँ।” ‘आग की भीख’ कविता में इसी अधीरता और बेचैनी को अभिव्यक्ति देते हुए उन्होंने लिखा है:  
    
बेचैन है हवायें, सब ओर बेकली है
कोई नहीं बताता किश्ती किधर चली है।
मँझधार है, भँवर है या पास किनारा?
यह नाश आ रहा है या सौभाग्य का सितारा?
यह तस्वीर है दिनकर के समय से कहीं अधिक आज के भारत की क्या यह सच नहीं कि आज का भारत खुद को एक ऐसे दोराहे पर खड़ा उन प्रश्नों से जूझ रहा है जिनके उत्तर से उसका भविष्य निर्धारित होगा? आज वही भारत खुद को असहिष्णुता के रास्ते पर बढ़ते देखने के लिए अभिशप्त है जिसकी बुनियाद ही सहिष्णुता और समन्वय पर टिकी है भारत की विडम्बना यह कि जहाँ पर इसे असहिष्णु होना चाहिए, वहाँ इसकी सहिष्णुता घुन की तरह इसे खोखला कर रही है और जहाँ पर इसे सहिष्णु होना चाहिए, वहाँ पर इसकी असहिष्णुता इसकी बुनियाद को हिला रही है ऐसे समय में जब ‘आईडिया ऑफ़ इंडिया’ अर्थात् ‘भारत की संकल्पना’ को लेकर टकराव अपने चरम पर है, दिनकर और उनके ‘संस्कृति के चार अध्याय’ की प्रासंगिकता से कौन इन्कार कर सकता है वरिष्ठ आलोचक नामवर सिंह ने इसके वैशिष्ट्य की दिशा में संकेत करते हुए लिखा है: “दिनकर भारत के सच्चे लोकतंत्र के चिंतक थे उनकी लिखी किताब 'संस्कृति के चार अध्याय' भारत की सामासिक संस्कृति का ग्रंथ है, न कि हिंदू संस्कृति का” एक ऐसे दौर में, जब हिन्दू और हिंदुत्व राष्ट्र एवं राष्ट्रवाद के पर्याय के तौर पर प्रस्तुत किये जा रहे हैं और हम इस लड़ाई को ‘वाम बनाम् दक्षिण’ की लड़ाई मानकर हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं, दिनकर की यह पंक्ति हमें उत्प्रेरित करती है तटस्थता तोड़ने के लिए:
'समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध,
जो तटस्थ है, समय लिखेगा उसका भी अपराध
'
दिनकर यही कहकर चुप्पी नहीं धारण कर लेते, वरन् एक कदम आगे बढ़कर स्पष्ट शब्दों में इस बात की घोषणा करते हैं:
छीनता हो स्वत्व कोई और,
तू त्याग-तप से काम ले यह पाप है,
पुण्य है विच्छिन्न कर देना उसे,
बढ़ रहा तेरी तरफ जो हाथ है
और इस क्रम में होने वाली हिंसा के लिए जिम्मेवार कौन है, होने वाली अपार जन-धन की हानि के लिए जिम्मेवार कौन है; तो इसका जवाब भी दिनकर ही देते हैं:
चुराता न्याय को जो, रण को बुलाता वही है;
युधिष्ठिर, सत्य की अन्वेषणा पातक  नहीं है
एक ऐसे दौर में, जब कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर तक अशांत है और आधा भारत वामपंथी उग्रवाद की चुनौतियों से निबटने में खुद को असमर्थ महसूस कर रहा है तथा सत्ता अपनी विफलता एवं अपनी जिम्मेवारियों की परवाह किये बगैर बन्दूक की नोंक पर शांति की स्थपना के लिए प्रतिबद्ध प्रतीत हो रही है, दिनकर की ये पंक्तियाँ आजाद भारत के रहनुमाओं के लिए चुनौती बनकर सामने आ रही है:
जब तक मनुज मनुज का यह सुख भाग नहीं सम होगा,
शमित न होगा कोलाहल संघर्ष नहीं कम होगा
यही वे परिस्थितियाँ रहीं होंगीं जिन्होंने दिनकर को यह लिखने के लिए विवश किया होगा:
सदियों की ठंढी-बुझी राख सुगबुगा उठी,
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है,
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन ख़ाली करो कि जनता आती है।
यह उद्घोष है राष्ट्रकवि का। आज अगर दिनकर होते, तो शायद ऐसा लिखने का साहस कर पाना उनके लिए मुश्किल होता; और अगर ऐसा लिखते, तो आज की सत्ता और आज की मीडिया उन्हें भी देशद्रोही घोषित करने में पल भर की देर नहीं लगाती। आज राष्ट्र और राष्ट्रवाद के नाम पर होने वाले विमर्श में दिनकर कहाँ पर खड़े हैं, इसके संकेत 1955 में लिखे उनके लेख ‘शांति की समस्या’ के इस उद्धरण से मिलते हैं:

प्रत्येक देश की वैश्विक नीति, उसके राष्ट्रीय चरित्र की परछाईं होती है हमारा राष्ट्रीय चरित्र योद्धा नहीं, शांति-सेवक का रहा है...भारत नाम में जो दिव्यता है, उसके प्रतीक यहाँ अर्जुन नहीं, युधिष्ठिर रहे हैं; चंद्रगुप्त नहीं अशोक रहे हैं... आनेवाला विश्व सिकंदर और हिटलर का विश्व नहीं, बुद्ध, ईसा, गांधी और जवाहर का संसार होगा’’
दिनकर की ये पंक्तियाँ सन्देश हैं उन लोगों के लिए, पाकिस्तान और चीन के बिना जिनकी राष्ट्रवादी चेतना की कल्पना नहीं की जा सकती है तथा जिनकी राष्ट्रवादी चेतना सडकों पर एवं सोशल मीडिया से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तक में छलकती रहती है अगर दिनकर की पुण्य-तिथि को लेकर हम वाकई गंभीर हैं, तो हमें दिनकर के आदर्शों का अनुकरण करना चाहिए दिनकर का राष्ट्रवाद न तो नस्लवाद के पर आधारित था और न ही किसी खास धर्म के विरोध में। दरअसल यह किसी भी प्रकार की प्रभुत्ववादी मानसिकता के विरोध में खड़ा था। इसके मूल में घृणा की बजाय प्रेम है और यह
“सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामया;
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चित् दु:खभाग्भवेत्।”
के आदर्शों से अनुप्राणित होने के कारण सांस्कृतिक मानवतावाद के धरातल पर खड़ा है। इसीलिए यह शोषित-उत्पीड़ित वर्गों की पीड़ा के प्रति संवेदनशील है। प्रमाण है 'रेशमी नगर' दिल्ली के नेताओं पर उनका यह व्यंग्य:
'रेशमी कलम से भाग्य-लेख लिखने वालो,
तुम भी अभाव से कभी ग्रस्त हो रोये हो क्या?
यह कोई कोरा सांस्कृतिक राष्ट्रवादनहीं है, जहाँ विद्रोह, बदलाव और अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक बुराइयों की आलोचना-प्रत्यालोचना के लिए कोई जगह नहीं है, तभी तो दिनकर समर निंद्य हैमें स्पष्ट शब्दों में घोषित करते हैं:
शांति खोलकर खड्ग क्रांति का जब वर्जन करती है,
तभी जान लो, किसी समर का वह सर्जन करती है
दिनकर में जो बेलाग कथन की यह शैली है, यही उन्हें युग की आवाज़ में तब्दील कर देती है; तभी तो वे यह कहने का साहस जुटा पाते हैं:
'सुनूँ क्या सिन्धु! मैं गर्जन तुम्हारा
स्वयं युगधर्म का हुँकार हूँ मैं!
वे यहीं पर नहीं रुकते। एक कदम आगे बढ़ते हैं और घोषित करते हैं कि:
दबी-सी आग हूँ भीषण क्षुधा का
दलित का मौन हाहाकार हूँ मैं
सजग संसार, तू निज को सम्हाले
प्रलय का क्षुब्ध पारावार हूँ मैं
शायद यही कारण है कि दिनकर जीवन-पर्यंत किसी एक खूँटे से बंधकर नहीं रहे; चाहे वह व्यक्ति हो, या फिर विचारधारा। उन्होंने जनहित और राष्ट्रहित को सर्वोपरि महत्व प्रदान किया, और इनमें भी “सबरि ऊपर मानुस-सत्य”:
श्रेय उसका प्राण  में बहती प्रणय की वायु ,
मानवों के हेतु अर्पित मानवों की आयु ।
श्रेय होगा धर्म का आलोक वह निर्बंध,
मनुज जोड़ेगा मनुज से जब उचित सम्बन्ध।
स्पष्ट है कि दिनकर कल भी प्रासंगिक थे, आज भी हैं और कल भी रहेंगे; पर उनके लिए, दिनकर के मूल्यों, सिद्धांतों एवं आदर्शों में जिनकी आस्था है; उनके लिए नहीं, जो ‘दिनकर के नाम’ पर दिनकर की राजनीति करते हैं। शायद यही कारण है कि आलोचकीय अनिच्छा के बावजूद जनता ने दिनकर को 'राष्ट्रकवि' के रूप में स्वीकारा और राष्ट्रकवि-सा स्नेह एवं प्रेम दिया। इसी प्रेम का नतीजा है कि ज्ञानपीठ सम्मान सहित हिन्दी के तमाम महत्वपूर्ण सम्मान एवं पुरस्कार मिलने के बावजूद हमें इस बात का मलाल होता और ऐसा लगता है कि दिनकर साहित्य-जगत् में जिस सम्मान के हकदार थे, वह सम्मान उन्हें नहीं मिल पाया  
  




4 comments:

  1. Sanchhep me likhe lekh se dinkar ko vistar se jankar . . . abhibhut huwa . . SADAR DHANYAWAD.

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  2. सर सामान्यतः दिनकर जी को वीर और श्रृंगार रस का कवि कहा जाता है। दिनकर जी की रचनाओं में वीर और श्रृंगार रस की धाराएं कहीं समानांतर बहती है तो कहीं घुलती मिलती हुई । इसमें से वीर रस का स्पष्ट संबंध मानवतावाद से है चाहे हम उस मानवतावादी चेतना को कोई भी नाम दें । दूसरी ओर श्रृंगार रस को भी दैहिक मांसलता से इतर काम के व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें तो इसमें भी समष्टि का हित घुलता हुआ दिखेगा।
    सर मार्गदर्शन करें ।

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  3. श्रृंगार का संचारी भाव प्रेम है और प्रेम में संयोग और वियोग दोनों है वीर रस में संचारी भाव है उत्साह ओज और यह मनुष्य को कुछ नया करने को प्रेरित करता है दोनों ही परिस्थिति में सर्जन संभव है मेरी समझ से दोनों ही रस का उद्देश्य एक सा है प्रेम में भी उत्तेजना होती है और वीर रस में भी आवेश होता है जयशंकर प्रसाद ने स्कंद गुप्त में देवसेना से कहलाया है कि युद्ध में भी श्रृंगार है

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