Sunday, 7 October 2018

स्वप्निल घर-बिखरा मकान


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स्वप्निल घर- बिखरा मकान
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घर,
एक सपना;
ऐसा सपना,
जिसे सच करने की शिद्दत से कोशिश,
और करती है उससे दूर;
खुद को पाता
मकान के करीब!
तुम नहीं समझोगे,
कि कैसा होता है घर बनाने का सपना;
और नहीं महसूस कर सकोगे तुम,
सपनों के टूटने का ग़म!
जुस्तजू जिसकी थी
उसे बिखरते देखा,
की समेटने की कोशिश;
पर, हर कोशिश के साथ
अरमान बिखरते गए,
सपने टूटते गए!
तुम क्या जानों,
कितनी लम्बी होती हैं रातें,
सिसकियाँ की,
उपजी हैं जो
अरमानों के बिखरने से!
काश! उन अरमानों को फिर से जिया जा सकता!
अहसासों को समेटा जा सकता,
और फिर कोशिश की जा सकती
घर बनाने के सपने को देखने की,
घर बनाने के सपने को जीने की,
घर को घर के रूप में देखने की शिद्दत भरी चाहनाओं की!
पर, बिखरते अरमान,
टूटते सपने,
बिछुड़ते अपने,
और,
और
घर घर नहीं,
हैं मकान!
यही सच है,
हमारा,
तुम्हारा, और
हम सबका!
पर, विडम्बना यह कि
घर घर तो कभी था ही नहीं,
और मकान बनाने की कभी इच्छा ही नहीं रही।

1 comment:

  1. सही कहा आपने सब सच !
    जब यादों के झरोखे में जाते होंगे
    एक पल भी ना गुजारा जाता होगा
    टूट से जाते होंगे
    तभी लगता होगा
    मेरा नहीं तेरा मकान ननन
    घर बनवाना है!
    दिल छू गयी आपकी रचना !
    धन्यवाद आदरणीय गुरूजी !

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